भोपाल/जबलपुर। मध्यप्रदेश की महत्वाकांक्षी बरगी व्यपवर्तन परियोजना के तहत निर्मित स्लीमनाबाद टनल देश की सबसे लंबी जल सुरंग के रूप में तैयार होने जा रही है। लगभग 17 वर्षों की कठिन मेहनत और आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों के उपयोग के बाद यह परियोजना अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। सुरंग का केवल लगभग एक मीटर कार्य शेष है। इसके पूरा होते ही पहली बार नर्मदा नदी का जल प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी फ्लो) के माध्यम से विंध्य क्षेत्र और सोन नदी बेसिन तक पहुंचेगा, जिससे लाखों किसानों को स्थायी सिंचाई सुविधा मिलेगी।
पौराणिक महत्व से जुड़ी है स्लीमनाबाद टनल
स्लीमनाबाद टनल का महत्व केवल इंजीनियरिंग उपलब्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार मैकल पर्वत से निकली मां नर्मदा और सोनभद्र अलग-अलग दिशाओं में प्रवाहित हुए थे। यह सुरंग प्रतीकात्मक रूप से उन दोनों नदियों को जोड़ने का कार्य करेगी और विंध्य क्षेत्र की सूखी धरती तक नर्मदा का अमृत समान जल पहुंचाएगी।
बरगी बांध से छह जिलों तक पहुंचेगा नर्मदा का जल
बरगी व्यपवर्तन परियोजना के अंतर्गत जबलपुर स्थित बरगी बांध से निकलने वाली 197 किलोमीटर लंबी दायीं तट मुख्य नहर के माध्यम से नर्मदा का जल जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना जिलों के लगभग 1450 गांवों तक पहुंचेगा। इस परियोजना से कुल 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को स्थायी सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। यह प्रदेश की सबसे अधिक 227 क्यूमेक डिस्चार्ज क्षमता वाली नहर परियोजना है।
परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती नर्मदा और सोन घाटियों के बीच स्थित विंध्य पर्वतमाला थी। यहां लगभग 40 मीटर ऊंची रिज लाइन को पार करना पारंपरिक तकनीकों से संभव नहीं था। यदि ओपन कट तकनीक अपनाई जाती तो करीब 4 करोड़ घनमीटर खुदाई करनी पड़ती, जिससे लागत और समय दोनों में भारी वृद्धि होती।इसी चुनौती का समाधान स्लीमनाबाद टनल के रूप में निकाला गया। करीब 11.952 किलोमीटर लंबी और 10.14 मीटर व्यास वाली यह सुरंग देश की सबसे लंबी जल सुरंग है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें नर्मदा का जल बिना किसी पंप के केवल प्राकृतिक ढाल के सहारे प्रवाहित होगा।
निर्माण के दौरान आईं कई तकनीकी चुनौतियां
सुरंग निर्माण के दौरान इंजीनियरों और विशेषज्ञों को बेहद जटिल भू-गर्भीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। निर्माण क्षेत्र में मार्बल, लाइमस्टोन, डोलोमाइट, स्लेट, रेसिडुअल मिट्टी और मिश्रित चट्टानी संरचनाएं लगातार बदलती रहीं। इसके अलावा बड़े-बड़े भूमिगत कैविटी, सिंकहोल, ऊंचा भूजल स्तर, मड स्लिपेज और कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन जैसी समस्याओं ने कार्य को और चुनौतीपूर्ण बना दिया।टनल में 18 हजार से 25 हजार लीटर प्रति मिनट तक पानी का रिसाव भी हुआ। कठोर चट्टानों के कारण टनल बोरिंग मशीन (TBM) के कटर हेड कई बार क्षतिग्रस्त हुए, जिससे निर्माण कार्य प्रभावित हुआ।
जर्मन तकनीक और आधुनिक मशीनों से मिली सफलता
परियोजना के शुरुआती चरण में अपस्ट्रीम दिशा से टनल बोरिंग मशीन के माध्यम से खुदाई की गई, लेकिन अत्यधिक कठोर चट्टानों के कारण मशीन क्षतिग्रस्त हो गई। इसके बाद डाउनस्ट्रीम दिशा से जर्मन HK टनल बोरिंग मशीन की मदद से कार्य आगे बढ़ाया गया।निर्माण में TAM ग्राउटिंग, हाई-कैपेसिटी डी-वॉटरिंग सिस्टम, कोर ड्रिलिंग और दोनों सिरों से एक साथ बोरिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया। लगभग 17 वर्षों की निरंतर मेहनत के बाद अब सुरंग का निर्माण अंतिम चरण में पहुंच चुका है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मिली परियोजना को नई गति
प्रदेश सरकार के अनुसार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NVDA) की टीम के समन्वित प्रयासों से वर्षों से लंबित इस परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाया गया। सुरंग राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे लाइन, भूमिगत संरचनाओं और आबादी वाले क्षेत्रों के नीचे से सुरक्षित तरीके से निकाली गई है, जिससे किसी भी संरचना को नुकसान नहीं पहुंचा। प्रभावित परिवारों का पुनर्वास, उचित मुआवजा और सुरक्षित स्थानांतरण भी पारदर्शी ढंग से पूरा किया गया।
1.85 लाख हेक्टेयर भूमि को मिलेगा सिंचाई का लाभ
टनल पूरी होने के बाद कटनी जिले की 21,823 हेक्टेयर, मैहर की 54,227 हेक्टेयर, सतना की 1,04,970 हेक्टेयर, पन्ना की 448 हेक्टेयर तथा रीवा की 3,532 हेक्टेयर भूमि सहित कुल 1.85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई के लिए नर्मदा का जल मिलेगा। इससे किसानों की उत्पादकता बढ़ेगी, फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा और विंध्य क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी।
चरणबद्ध तरीके से बढ़ेगी सिंचाई क्षमता
टनल के बाद बनने वाले नहर नेटवर्क और वितरण प्रणाली का कार्य भी तेजी से जारी है। वर्तमान में आठ निर्माण समूहों में कार्य प्रगति पर है। योजना के अनुसार मार्च 2026 तक 44,160 हेक्टेयर, दिसंबर 2026 तक 87,433 हेक्टेयर तथा दिसंबर 2027 तक 1,54,693 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता विकसित की जाएगी। इसके अतिरिक्त जल संसाधन विभाग की अन्य परियोजनाओं के लिए 30,307 हेक्टेयर क्षेत्र को भी जल उपलब्ध कराया जाएगा। इस प्रकार कुल 1.85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
विंध्य क्षेत्र के विकास का नया अध्याय
विशेषज्ञों का मानना है कि स्लीमनाबाद टनल केवल एक इंजीनियरिंग उपलब्धि नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश के जल प्रबंधन, कृषि विकास और क्षेत्रीय संतुलित विकास की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। नर्मदा के जल से सिंचित होने वाले लाखों हेक्टेयर खेतों में उत्पादन बढ़ेगा, किसानों की आय में वृद्धि होगी और विंध्य क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। यह परियोजना आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई एवं आधारभूत संरचना विकास कार्यों में गिनी जाएगी।