नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के दौरान कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) को लेकर स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया। उन्होंने मौजूदा कानून की समीक्षा करने और इस पर व्यापक चर्चा कराने की मांग करते हुए कहा कि देश को ऐसा कानूनी ढांचा चाहिए, जो राजनीतिक अवसरवाद पर रोक लगाए, लेकिन जनप्रतिनिधियों को अपनी अंतरात्मा और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर असहमति जताने का अधिकार भी दे। मनीष तिवारी का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाएं और अधिक मजबूत बन सकें।
क्या है मनीष तिवारी की मांग?
लोकसभा में दिए गए नोटिस में कांग्रेस सांसद ने कहा कि मौजूदा दलबदल विरोधी कानून में संशोधन पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। उनका तर्क है कि कानून ऐसा हो जो केवल सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य से होने वाले राजनीतिक दलबदल को रोके, लेकिन सांसदों और विधायकों की ईमानदार असहमति या विचार रखने की स्वतंत्रता को प्रभावित न करे। उनके अनुसार लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही के साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संतुलन भी जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद तेज हुई बहस
यह मुद्दा ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) के उस प्रावधान को चुनौती दी गई है, जिसके तहत कुछ परिस्थितियों में पार्टी विलय के आधार पर सांसद या विधायक अयोग्यता से बच सकते हैं। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय को महत्वपूर्ण बताते हुए संकेत दिया कि इस तरह के संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा होना आवश्यक है।
क्या है दलबदल विरोधी कानून?
दलबदल विरोधी कानून का उद्देश्य निर्वाचित सांसदों और विधायकों को बिना उचित कारण पार्टी बदलने से रोकना है। यह कानून संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत लागू है। यदि कोई जनप्रतिनिधि निर्धारित नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। हालांकि समय-समय पर इस कानून की प्रभावशीलता और इसके कुछ प्रावधानों को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस होती रही है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
विशेषज्ञों का मानना है कि दलबदल विरोधी कानून राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। वहीं, कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि कानून में ऐसे प्रावधान भी होने चाहिए, जो जनप्रतिनिधियों की वैचारिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक असहमति की रक्षा कर सकें। ऐसे में संसद में इस विषय पर चर्चा भविष्य में संभावित सुधारों की दिशा तय कर सकती है।