मुंबई:सूचना का अधिकार (RTI) के तहत हुए एक बड़े खुलासे में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) ने यह स्वीकार किया है कि वित्त वर्ष 2020-21 से 2025-26 के दौरान ₹100 करोड़ या उससे अधिक बकाए वाले खातों के ₹35,715 करोड़ के कर्ज तकनीकी रूप से माफ (Technical Write-off) किए गए हैं। पुणे के अधिकार कार्यकर्ता विवेक वेलणकर द्वारा दायर RTI के जवाब में बैंक ने बड़े पैमाने पर किए गए इस 'राइट-ऑफ' की आधिकारिक पुष्टि की है। हालांकि, बैंक ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(j) के तहत गोपनीयता का हवाला देते हुए इन बड़े डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है।
'हेयरकट' के तहत केवल 28 प्रतिशत राशि की हुई वसूली
RTI से मिले आंकड़ों के अनुसार, 6 वित्त वर्षों के दौरान बैंक ₹100 करोड़ से अधिक बकाए वाले बड़े खातों से केवल 28 प्रतिशत यानी ₹9,946 करोड़ ही वसूल करने में सक्षम रहा है। वहीं, इन खातों के निपटारे (Settlement) के दौरान 'हेयरकट' के रूप में ₹7,817 करोड़ की सीधी छूट दी गई। बैंकिंग भाषा में 'हेयरकट' का तात्पर्य किसी संपत्ति के बाजार मूल्य में कमी या ऋणदाता द्वारा अपनी बकाया राशि का एक हिस्सा छोड़ देने से होता है। बैंक के आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक राइट-ऑफ वित्त वर्ष 2020-21 में (₹11,916 करोड़) और 2021-22 में (₹11,261 करोड़) दर्ज किए गए थे।
छोटे और बड़े कर्जदारों पर बैंक के दोहरे रवैये पर उठे सवाल
RTI आवेदनकर्ता विवेक वेलणकर ने बैंक की इस नीति पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि होम लोन, ऑटो लोन या पर्सनल लोन लेने वाले छोटे ग्राहकों के मामूली बकाए पर बैंक कड़ा रुख अपनाते हैं, नीलामी की नोटिस जारी करते हैं और अखबारों में उनके नाम-पते प्रकाशित करते हैं। इसके विपरीत, सैकड़ों करोड़ रुपये का कर्ज लेकर न चुकाने वाले बड़े कॉरपोरेट घरानों को 'तकनीकी राइट-ऑफ' और 'हेयरकट' का लाभ देकर उनके नाम गुप्त रखे जा रहे हैं। बैंकिंग विशेषज्ञों ने भी इस प्रक्रिया पर चिंता जताते हुए बैंक प्रबंधन के फैसलों और जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।

बैंक का पक्ष: 'राइट-ऑफ का मतलब कर्ज माफी नहीं'
विवाद पर बैंक ऑफ बड़ौदा ने स्पष्ट किया कि 'तकनीकी अवलेखन' (Technical Write-off) एक नियमित अकाउंटिंग प्रक्रिया है, जिसका उपयोग बैलेंस शीट को साफ रखने के लिए किया जाता है। बैंक का दावा है कि खातों से हटाए जाने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि कर्ज पूरी तरह माफ कर दिया गया है। बकाएदारों से धन की वसूली के लिए कानूनी और प्रशासनिक प्रयास जारी रहते हैं। तीसरे पक्ष की गोपनीयता और व्यक्तिगत जानकारी का हवाला देते हुए बैंक ने बड़े डिफॉल्टर्स की सूची साझा करने में असमर्थता व्यक्त की है।
डेटा लीक के बाद वित्तीय पारदर्शिता पर गहराया संकट
हाल ही में बैंक ऑफ बड़ौदा के कर्मचारियों के ईमेल हैक होने से 1 टेराबाइट से अधिक संवेदनशील डेटा लीक होने का दावा सामने आया था। डेटा लीक के बाद अब हजारों करोड़ रुपये के कर्ज राइट-ऑफ और बड़े डिफॉल्टर्स की गोपनीयता का मामला सामने आने से बैंक की आंतरिक सुरक्षा, लोन रिकवरी प्रक्रिया और वित्तीय जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वित्तीय विश्लेषक और आरटीआई कार्यकर्ता मामले की पारदर्शी जांच और जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।