नई दिल्ली: हाल ही में संपन्न हुए तीन राज्यों के विधानसभा उप-चुनावों के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के भीतर अंदरूनी कलह और सांगठनिक असंतोष को उजागर कर दिया है। बिहार की प्रतिष्ठित बांकीपुर सीट पर बीजेपी की हार के साथ-साथ मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मंजलपुर सीट के नतीजों ने पार्टी नेतृत्व के लिए गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
बांकीपुर में बीजेपी का गढ़ ढहा, युवा मतदाताओं की बेरुखी मुख्य वजह
पटना की बांकीपुर सीट बीजेपी का पारंपरिक गढ़ मानी जाती रही है, जहां से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लंबे समय तक विधायक रहे हैं। इस उप-चुनाव में बांकीपुर की हार के पीछे क्षेत्र के एक-तिहाई युवा (जन-जी) मतदाताओं की बेरुखी और बेरोज़गारी से उपजे असंतोष को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
बेरोज़गारी और 'जन-जी' आंदोलन से युवाओं का बढ़ता आक्रोश
- संसद भवन में गूंजा था असंतोष: लखनऊ के सागर शर्मा, हरियाणा की नीलम वर्मा, बेंगलुरु के डी मनोरंजन और अमोल शिंदे जैसे उच्च शिक्षित लेकिन बेरोज़गार युवाओं ने बेरोज़गारी और महंगाई के खिलाफ संसद भवन में विरोध जताया था।
- सोशल मीडिया से बना नेटवर्क: अलग-अलग राज्यों के रहने वाले इन युवाओं का आपसी संपर्क फेसबुक के ज़रिए हुआ था, जहां बेरोज़गारी से उपजी निराशा ही उनके एक साथ आने की मुख्य वजह बनी।
- 'कॉकरोच जनता पार्टी' और जन-आंदोलन: देश में हालिया जन-जी (Gen-Z) आंदोलनों और छात्र विरोध प्रदर्शनों के दबाव के कारण सरकार को शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तक स्वीकार करना पड़ा।
दतिया में गुटबाज़ी से नुकसान, मंजलपुर में घटी जीत की मार्जिन
मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट, जो पहले कांग्रेस के पास थी, वहां बीजेपी की हार का मुख्य कारण पार्टी की अंदरूनी गुटबाज़ी और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का खुला असंतोष रहा। वहीं गुजरात की मंजलपुर सीट पर बीजेपी ने जीत तो दर्ज की, लेकिन जीत का अंतर बेहद कम रहा। तीनों ही सीटों पर उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी को भारी विरोध का सामना करना पड़ा।
पार्टी के भीतर फैसलों पर उठने लगे सवाल
उप-चुनावों के इस रुझान ने केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और गुटबाज़ी को लेकर नेताओं का असंतोष अब सतह पर आने लगा है, जो आने वाले समय में पार्टी के सांगठनिक ढांचे के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
सांगठनिक स्तर पर बढ़ता असंतोष और शीर्ष नेतृत्व की चुनौती
- पार्टी अध्यक्ष के चयन में देरी: भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए नितिन नवीन के नाम पर सहमति बनाने के लिए पार्टी और आरएसएस (RSS) को महीनों तक कई दौर की बैठकें करनी पड़ीं।
- संसद सत्र में सरकार की अनुपस्थिति पर सवाल: संसद के हालिया मानसून सत्र के दौरान प्रधानमंत्री की सीमित उपस्थिति और विपक्ष के सवालों पर गृह मंत्री के जवाब न देने को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज़ हैं।
- केंद्रीय फैसलों पर उठते सवाल: राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पार्टी के भीतर अब केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिसे सांगठनिक स्तर पर बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।