नई दिल्ली. भारत मौसम विज्ञान विभाग की नवीनतम रिपोर्ट ने मौसम के मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है। मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य स्तर से ऊपर पहुंच चुका है, जिससे अल नीनो की स्थिति बनने की पुष्टि हुई है। समुद्री तापमान में यह वृद्धि केवल महासागर तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसके प्रभाव अब वायुमंडलीय परिस्थितियों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। यही कारण है कि मौसम वैज्ञानिक इस घटनाक्रम को सामान्य मौसमी परिवर्तन नहीं बल्कि वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण घटना के रूप में देख रहे हैं।
अल नीनो की आधिकारिक शुरुआत ने बदले मानसून के समीकरण
मौसम विभाग के अनुसार भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में मौजूद परिस्थितियां अब अल नीनो की आधिकारिक श्रेणी में प्रवेश कर चुकी हैं। इसके आकलन के लिए उपयोग किए जाने वाले नीनो 3.4 सूचकांक का तीन माह का औसत निर्धारित सीमा से ऊपर पहुंच गया है, जो इस घटना की औपचारिक शुरुआत का संकेत माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले सप्ताहों में समुद्री तापमान इसी गति से बढ़ता रहा तो अल नीनो और अधिक प्रभावशाली रूप धारण कर सकता है। इसका सीधा असर दक्षिण-पश्चिम मानसून की तीव्रता और वर्षा के भौगोलिक वितरण पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
समुद्र की सतह के नीचे भी दिख रहे हैं असामान्य संकेत
मौसम वैज्ञानिकों की चिंता केवल समुद्र की सतह तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार प्रशांत महासागर के बड़े हिस्सों में सतह के नीचे भी सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया गया है। यह स्थिति इस बात का संकेत मानी जा रही है कि महासागर के भीतर मौजूद गर्म जलराशि आने वाले समय में सतह पर उभर सकती है, जिससे अल नीनो की तीव्रता और बढ़ सकती है। समुद्री विज्ञान के विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी परिस्थितियां अक्सर लंबे समय तक प्रभावी रहने वाले अल नीनो का आधार बनती हैं और वैश्विक स्तर पर मौसम पैटर्न में उल्लेखनीय परिवर्तन ला सकती हैं।
भारत के मानसून और कृषि पर क्या पड़ सकता है प्रभाव
ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो अल नीनो का भारत में अक्सर कमजोर मानसून, कम वर्षा, अधिक तापमान और कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियों से संबंध रहा है। हालांकि प्रत्येक अल नीनो वर्ष समान प्रभाव नहीं छोड़ता, फिर भी इसकी मौजूदगी कृषि, जल संसाधन और खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जाती है। यदि मानसून की वर्षा सामान्य से कम रहती है तो इसका असर खरीफ फसलों की बुवाई, जलाशयों के स्तर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि मौसम विभाग और कृषि विशेषज्ञ दोनों इस घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
भारतीय महासागर की भूमिका भी रहेगी महत्वपूर्ण
मौसम विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि भारत का मानसून केवल अल नीनो से प्रभावित नहीं होता बल्कि अनेक महासागरीय और वायुमंडलीय कारक मिलकर इसकी दिशा तय करते हैं। वर्तमान में भारतीय महासागर द्विध्रुव की स्थिति तटस्थ बनी हुई है और मानसून काल के दौरान इसके भी तटस्थ बने रहने की संभावना व्यक्त की गई है। तटस्थ स्थिति का अर्थ यह है कि यह कारक न तो अल नीनो के प्रभाव को विशेष रूप से बढ़ाएगा और न ही उसे उल्लेखनीय रूप से कम करेगा। ऐसे में मानसून की वास्तविक स्थिति का आकलन आने वाले महीनों में विकसित होने वाले अन्य मौसमी संकेतों पर भी निर्भर करेगा।
जापान से आई राहत की संभावित खबर
इस बीच जापान की मौसम विज्ञान एजेंसी ने एक ऐसा संकेत दिया है जो भारत के लिए राहत का कारण बन सकता है। एजेंसी का अनुमान है कि जुलाई के आसपास सकारात्मक भारतीय महासागर द्विध्रुव विकसित हो सकता है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार सकारात्मक भारतीय महासागर द्विध्रुव अक्सर भारतीय मानसून को मजबूती प्रदान करता है और अल नीनो के नकारात्मक प्रभावों को कुछ हद तक संतुलित करने की क्षमता रखता है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो मानसून पर पड़ने वाले संभावित प्रतिकूल प्रभावों में कमी आ सकती है और कई क्षेत्रों में वर्षा की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रह सकती है।
आने वाले महीनों पर टिकी देशभर की निगाहें
मानसून भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि और जल प्रबंधन व्यवस्था की जीवनरेखा माना जाता है। ऐसे में अल नीनो की उभरती स्थिति ने स्वाभाविक रूप से मौसम वैज्ञानिकों, किसानों और नीति निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। मौसम विभाग ने स्पष्ट किया है कि वह प्रशांत महासागर और अन्य महासागरीय क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तनों की लगातार निगरानी कर रहा है तथा समय-समय पर अद्यतन जानकारी जारी करता रहेगा। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि अल नीनो कितना मजबूत होता है और उसका भारतीय मानसून पर वास्तविक प्रभाव किस स्तर तक दिखाई देता है।