नई दिल्ली. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 5 नवंबर 2026 को सुबह लगभग 11:10 बजे ओडिशा तट के पास स्थित डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से ‘प्रलय’ मिसाइल का उड़ान परीक्षण किया। यह परीक्षण उपयोगकर्ता मूल्यांकन परीक्षणों के तहत किया गया, जिसमें रक्षा बलों के प्रतिनिधियों और संबंधित औद्योगिक भागीदारों की मौजूदगी रही। चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज के निगरानी उपकरणों ने मिसाइल की उड़ान से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े दर्ज किए। इन आंकड़ों के आधार पर रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की कि परीक्षण के सभी निर्धारित उद्देश्य सफलतापूर्वक पूरे हुए।
150 से 500 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता
‘प्रलय’ सतह से सतह पर मार करने वाली कम दूरी की मिसाइल है। इसकी मारक क्षमता लगभग 150 से 500 किलोमीटर तक बताई जाती है, जो इसके साथ इस्तेमाल किए जाने वाले पेलोड और उड़ान संबंधी परिस्थितियों पर निर्भर करती है। यह 350 से 1,000 किलोग्राम तक की पारंपरिक युद्धक सामग्री ले जाने में सक्षम है। अलग-अलग प्रकार के लक्ष्यों के लिए इसमें विभिन्न किस्म के पारंपरिक वारहेड इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इस क्षमता के कारण यह दुश्मन के सैन्य ठिकानों, रणनीतिक प्रतिष्ठानों और अन्य महत्वपूर्ण लक्ष्यों को निशाना बनाने वाली प्रभावी सामरिक मिसाइल के रूप में उपयोगी हो सकती है।
क्वासी-बैलिस्टिक तकनीक बनाती है इसे खास
प्रलय को क्वासी-बैलिस्टिक यानी अर्ध-बैलिस्टिक मिसाइल की श्रेणी में रखा गया है। पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलें सामान्यतः एक निर्धारित प्रक्षेपवक्र पर उड़ान भरती हैं, जबकि क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल उड़ान के दौरान अपनी दिशा और प्रक्षेपवक्र में बदलाव करने की क्षमता रखती है। इस विशेषता के कारण दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों के लिए इसके संभावित मार्ग का सटीक अनुमान लगाना और इसे बीच में रोकना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसमें ठोस ईंधन आधारित प्रणोदन के साथ आधुनिक मार्गदर्शन और नौवहन प्रणाली का इस्तेमाल किया गया है, जो लक्ष्य तक सटीक पहुंचने में मदद करती है।
DRDO ने स्वदेशी तकनीक से किया विकसित
प्रलय का विकास हैदराबाद स्थित अनुसंधान केंद्र इमारत ने DRDO की अन्य प्रयोगशालाओं के सहयोग से किया है। इसके निर्माण और उत्पादन में भारत डायनेमिक्स लिमिटेड की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जो विकास-सह-उत्पादन भागीदार के रूप में इससे जुड़ी है। स्वदेशी तकनीक पर आधारित इस मिसाइल का विकास भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता और सैन्य जरूरतों के अनुरूप आधुनिक हथियार प्रणालियां तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसके सफल परीक्षण से यह भी स्पष्ट हुआ है कि देश उन्नत निर्देशित मिसाइल प्रणालियों के विकास और उनके परीक्षण में लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।
चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर बढ़ेगी सामरिक क्षमता
भारत की भौगोलिक और सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए प्रलय का सामरिक महत्व काफी व्यापक है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और नियंत्रण रेखा (LoC) जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में किसी संभावित सैन्य टकराव की स्थिति में कम दूरी की सटीक मारक क्षमता महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा पर सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर ऐसी मिसाइलें दुश्मन के सैन्य ठिकानों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के विरुद्ध पारंपरिक जवाबी क्षमता को मजबूत कर सकती हैं। हालांकि, किसी भी हथियार प्रणाली की वास्तविक उपयोगिता उसकी तैनाती, सैन्य योजना, लक्ष्य निर्धारण और अन्य रक्षा प्रणालियों के साथ समन्वय पर निर्भर करती है।
एकीकृत रॉकेट फोर्स की योजना में अहम भूमिका
भारत अपनी पारंपरिक सैन्य मारक क्षमता को अधिक आधुनिक और प्रभावी बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इसी व्यापक रणनीति के तहत एकीकृत रॉकेट फोर्स की अवधारणा पर भी चर्चा होती रही है, जिसमें विभिन्न प्रकार की मिसाइल और रॉकेट प्रणालियों को एक समन्वित ढांचे में इस्तेमाल किया जा सकता है। प्रलय जैसी कम दूरी की सटीक मारक मिसाइल ऐसी व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे सेना को युद्धक्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग दूरी और प्रकार के लक्ष्यों पर पारंपरिक प्रहार करने के अधिक विकल्प मिलेंगे। हालांकि, इसके औपचारिक संगठनात्मक ढांचे और तैनाती से जुड़ी अंतिम जानकारी अलग से सामने आना बाकी है।
सेना में शामिल होने की दिशा में बढ़ा कदम
इस सफल परीक्षण के बाद रक्षा मंत्रालय ने संकेत दिया है कि प्रलय मिसाइल प्रणाली को सशस्त्र बलों में शामिल किए जाने की प्रक्रिया निर्णायक चरण में पहुंच गई है। परीक्षण के दौरान सभी निर्धारित मानकों पर खरा उतरना इसके सैन्य उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उपयोगकर्ता मूल्यांकन परीक्षणों का उद्देश्य केवल तकनीकी प्रदर्शन की पुष्टि करना नहीं, बल्कि सेना की परिचालन जरूरतों के अनुरूप प्रणाली की उपयुक्तता का आकलन करना भी होता है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि पर DRDO, सशस्त्र बलों और उद्योग से जुड़े भागीदारों को बधाई दी है। आधुनिक तकनीक से लैस यह मिसाइल भारतीय सेना की तकनीकी क्षमता और बदलती सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की तैयारी को और मजबूत कर सकती है।