कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने सबसे बुरे दौर और आंतरिक बगावत से गुजर रही है। जहां एक तरफ 61 विधायकों ने कालीघाट की बैठक का बहिष्कार कर बगावत का बिगुल फूंक दिया है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के कद्दावर नेता और बेलेघाटा से नवनिर्वाचित विधायक कुणाल घोष (Kunal Ghosh) खुलकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के समर्थन में खड़े हो गए हैं। कुणाल घोष ने एक लंबा बयान जारी कर उन नेताओं को आड़े हाथों लिया है जो पार्टी का अच्छा वक्त चले जाने के बाद अब बगावत की राह पर हैं।
"पार्टी से गुस्सा और दर्द था, लेकिन मैं गद्दार नहीं हूँ"
कुणाल घोष ने बेहद भावुक और आक्रामक अंदाज में अपनी स्थिति साफ करते हुए कहा, "मैं तृणमूल कांग्रेस में हूँ और रहूँगा। पार्टी नेतृत्व के प्रति मेरे मन में कई शिकायतें, गुस्सा और दर्द था और आज भी है। मैं चापलूसों, अवसरवादियों और कुछ नेताओं के अपरिपक्व व्यवहार के खिलाफ हमेशा रहा हूँ। एक समय इन्हीं में से कुछ लोगों ने मेरा जीवन और करियर बर्बाद करने की साजिश रची थी, तब आज के ये 'क्रांतिकारी' बागी नेता चुप थे। लेकिन इन सबके बावजूद मैं पार्टी का एक सच्चा सैनिक बनकर रहा।"
जीत के एक महीने के भीतर बगावत? यह कायरता है
बागी विधायकों पर तीखा हमला बोलते हुए कुणाल घोष ने कहा, "अभी चुनाव नतीजे आए एक महीना भी नहीं हुआ है। अगर आज दीदी (ममता बनर्जी) मुख्यमंत्री बन जातीं, तो यही लोग मंत्री पद पाने के लिए लॉबिंग कर रहे होते। अब अचानक हार के बाद दूरी बनाना सिर्फ और सिर्फ कायरता (डरपोकपन) है। अगर कोई शिकायत है, तो पार्टी की बैठक में खुलकर कहो, जरूरत पड़े तो सार्वजनिक रूप से कहो, लेकिन पार्टी के भीतर रहकर। अच्छे समय में सत्ता, पद और सेल्फी चाहिए थी, और अब बुरा वक्त आते ही घुटने कांपने लगे? विपक्ष का विधायक बनने में इतना डर? क्या सत्ता पक्ष में रहने पर ही तुम्हारी बहादुरी दिखती है?"
ममता बनर्जी के चेहरे और सिंबल पर जीते, अब पीठ में छुरा घोंप रहे हैं
कुणाल घोष ने विधायकों द्वारा गुप्त रूप से विपक्ष (भाजपा) के पास जाकर शिकायत करने को सबसे बड़ा विश्वासघात बताया। उन्होंने कहा, "ये लोग निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नहीं जीते हैं। इन्होंने ममता दीदी का चेहरा, उनका नाम और पार्टी का सिंबल इस्तेमाल करके जीत हासिल की है। अब जीतने के तुरंत बाद दीदी के खिलाफ जाना गद्दारी है। बेलेघाटा की जनता ने मुझे जिताया है, अगर मैं आज दल बदलूँ या बगावत करूँ, तो जनता मुझे गद्दार और बेईमान समझेगी। मैं अपनी नजरों में छोटा नहीं होना चाहता।"
गलती हमारी ही थी, हमने गलत लोगों को सिर पर बिठाया
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की कमियों को स्वीकार करते हुए कुणाल घोष ने लिखा, "मैं मानता हूँ कि पार्टी से शुरू से ही लोगों को पहचानने में गलती हुई है। काम करने के तरीके में बड़ी भूल हुई, यह एक मस्त बड़ी भूल है। जहाँ तक भाजपा का सवाल है, अगर वे तृणमूल के लोगों को तोड़ रहे हैं, तो मैं उन्हें दोष नहीं देता। वे सत्ता में हैं, वे पहले भी 'योगदान मेला' करते रहे हैं। लेकिन दूसरों पर उंगली उठाने से पहले हमें अपने घर की तरफ देखना होगा। जो लोग आज 'दम घुटने' का नाटक कर रहे हैं, उनकी अंतरात्मा तब क्यों नहीं जागी जब वे टिकट ले रहे थे?"
अंत में कुणाल घोष ने कार्यकर्ताओं को संदेश देते हुए साफ किया, "चाहे मेरे ऊपर कितने भी संकट आएं, कोई भी प्रताड़ना झेलनी पड़े, मैं ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़ा रहूँगा। इतिहास याद रखेगा कि जब संकट के समय पूरी पार्टी मेरा साथ छोड़कर हट गई थी, तब भी कुणाल घोष ने पार्टी का साथ नहीं छोड़ा था।"