नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि उनका संपूर्ण जीवन भारत की आध्यात्मिक परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र निर्माण के आदर्शों का जीवंत प्रतीक रहा है। प्रधानमंत्री ने सामाजिक माध्यम ‘एक्स’ पर अपने संदेश में कहा कि स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति और अध्यात्म को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाई तथा उनके विचार आज भी देश के करोड़ों युवाओं को राष्ट्र सेवा, आत्मविश्वास और सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि उनके आध्यात्मिक संदेश विकसित भारत के संकल्प को साकार करने की दिशा में देश को निरंतर नई ऊर्जा प्रदान करते रहेंगे।
भारतीय अध्यात्म को विश्व मंच तक पहुंचाने वाले युगद्रष्टा
स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के उन महान विचारकों में गिने जाते हैं जिन्होंने भारतीय दर्शन, वेदांत और सनातन आध्यात्मिक परंपरा को वैश्विक स्तर पर नई प्रतिष्ठा दिलाई। उनका मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था और वे श्री रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्य थे। उन्होंने अपने गुरु के आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए समाज सेवा, आध्यात्मिक जागरण और मानव कल्याण को जीवन का लक्ष्य बनाया। उनके प्रयासों से स्थापित रामकृष्ण मिशन आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और आध्यात्मिक उत्थान के क्षेत्र में देश-विदेश में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। इतिहासकारों का मानना है कि स्वामी विवेकानंद ने भारतीय आत्मविश्वास को ऐसे समय नई दिशा दी, जब देश सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों से गुजर रहा था।
शिकागो का ऐतिहासिक भाषण बना विश्व में भारत की पहचान
स्वामी विवेकानंद को वर्ष 1893 में अमेरिका के शिकागो नगर में आयोजित विश्व धर्म संसद में दिए गए ऐतिहासिक संबोधन के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व पहचान मिली। अपने प्रसिद्ध संबोधन की शुरुआत "अमेरिका की बहनों और भाइयों" शब्दों से करते ही उन्होंने उपस्थित श्रोताओं का हृदय जीत लिया। इस भाषण में उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता, मानव एकता, सार्वभौमिक भाईचारे और भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के मूल सिद्धांतों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। अंतरराष्ट्रीय विद्वानों का मानना है कि इस संबोधन ने विश्व समुदाय के समक्ष भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को नए सम्मान के साथ स्थापित किया तथा वैश्विक स्तर पर भारत की सकारात्मक छवि को मजबूत किया।
युवा शक्ति को आत्मविश्वास, सेवा और राष्ट्र निर्माण का संदेश
स्वामी विवेकानंद का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके युवा होते हैं। उन्होंने युवाओं को आत्मविश्वासी, चरित्रवान, अनुशासित और कर्मनिष्ठ बनने का संदेश दिया। उनका प्रसिद्ध आह्वान—"उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक मत रुको"—आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत माना जाता है। शिक्षा को उन्होंने केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्र सेवा का आधार बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि आज के प्रतिस्पर्धी और तकनीकी युग में भी उनके विचार नेतृत्व क्षमता, नैतिक मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व और सकारात्मक राष्ट्रवाद की दिशा में समान रूप से प्रासंगिक बने हुए हैं।
आज भी प्रासंगिक हैं स्वामी विवेकानंद के आदर्श
समकालीन भारत में स्वामी विवेकानंद के विचार केवल आध्यात्मिक प्रेरणा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक समरसता, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, मानव सेवा और राष्ट्रीय विकास जैसे अनेक क्षेत्रों में मार्गदर्शक सिद्ध हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आत्मनिर्भर, समावेशी और विकसित भारत के निर्माण की परिकल्पना में उनके विचार आज भी महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं। प्रधानमंत्री द्वारा उनकी पुण्यतिथि पर व्यक्त श्रद्धांजलि इस बात का भी प्रतीक है कि राष्ट्र निर्माण की आधुनिक यात्रा में स्वामी विवेकानंद के आदर्श और संदेश आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने एक शताब्दी पूर्व थे। उनकी प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान, सेवा, आत्मबल और राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने की निरंतर ऊर्जा प्रदान करती रहेगी।