पेरिस/लंदन। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया शांति समझौते के बाद भी पश्चिम एशिया में रणनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) को सुरक्षित बनाने के लिए फ्रांस और ब्रिटेन ने बड़ा कदम उठाया है। फ्रांस ने इस क्षेत्र में माइन काउंटरमेजर (Mine Countermeasure) यानी समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों (माइन्स) को खोजने और निष्क्रिय करने वाले विशेष युद्धपोत तैनात कर दिए हैं, जबकि ब्रिटेन ने भी ओमान के साथ मिलकर समुद्री सुरक्षा अभियान तेज कर दिया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य का सुरक्षित रहना बेहद जरूरी है। यदि स्थिति की मांग हुई तो फ्रांस अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर एक बड़े बहुराष्ट्रीय मिशन में भी हिस्सा लेने के लिए तैयार है।
आखिर क्यों इतना अहम है स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज?
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया का सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्ग माना जाता है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर और हिंद महासागर से जोड़ता है। दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देश- सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और ईरान—यहीं से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस का निर्यात करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के कारोबार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव या समुद्री बाधा वैश्विक तेल बाजार, ऊर्जा कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सीधे प्रभावित कर सकती है।
फ्रांस ने कौन-कौन से सैन्य संसाधन भेजे?
राष्ट्रपति मैक्रों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए बताया कि फ्रांस ने पश्चिम एशिया में कई अहम सैन्य संसाधनों की तैनाती की है। इनमें शामिल हैं-
2 अत्याधुनिक माइनहंटर (Minehunter) जहाज
2 युद्धपोत (Frigates)
1 समुद्री गश्ती विमान (Maritime Patrol Aircraft)
इनका मुख्य उद्देश्य समुद्री मार्ग में मौजूद संभावित बारूदी सुरंगों की पहचान करना, उन्हें निष्क्रिय करना और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है।
चार्ल्स डी गॉल लौटेगा, लेकिन मिशन जारी रहेगा
मैक्रों ने बताया कि फ्रांस का परमाणु ऊर्जा से संचालित विमानवाहक पोत चार्ल्स डी गॉल (Charles de Gaulle) अब अपने घरेलू बंदरगाह टूलॉन लौट रहा है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि फ्रांस क्षेत्र से पीछे हट रहा है। राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि माइन हटाने वाले जहाज, उनके सुरक्षा एस्कॉर्ट और अन्य नौसैनिक संसाधन क्षेत्र में तैनात रहेंगे। जरूरत के अनुसार फ्रांस अपनी सैन्य मौजूदगी को बढ़ा या घटा सकता है।
अमेरिका-ईरान शांति समझौते का किया स्वागत
फ्रांस ने अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया शांति समझौता ज्ञापन (Peace Memorandum) का भी स्वागत किया है। मैक्रों ने इसे पश्चिम एशिया में स्थिरता की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने कहा कि ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक अल सईद के साथ चर्चा के बाद फ्रांस ने अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव किया है ताकि क्षेत्र में तनाव कम होने के बावजूद समुद्री सुरक्षा बनी रहे।
ब्रिटेन और ओमान भी मिशन में शामिल
फ्रांस के साथ ब्रिटेन ने भी ओमान के सहयोग से समुद्री सुरक्षा अभियान तेज कर दिया है। तीनों देशों ने संयुक्त रूप से कहा कि-
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा है।
सभी देशों के व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी है।
जरूरत पड़ने पर बहुराष्ट्रीय सैन्य मिशन भी शुरू किया जा सकता है।
सभी देश अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता का सम्मान करते हुए क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए मिलकर काम करेंगे।
आखिर माइनहंटर जहाज क्या होते हैं?
माइनहंटर विशेष नौसैनिक जहाज होते हैं, जिन्हें समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों (Naval Mines) का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए डिजाइन किया जाता है। इन जहाजों में अत्याधुनिक सोनार सिस्टम, अंडरवॉटर ड्रोन और विस्फोटक निष्क्रिय करने वाली तकनीक होती है। इनकी मदद से व्यापारिक और सैन्य जहाजों के लिए सुरक्षित समुद्री रास्ता तैयार किया जाता है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में किसी तरह की बाधा आती है तो इसका सीधा असर भारत के कच्चे तेल के आयात, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और शिपिंग लागत पर पड़ सकता है। हालांकि फ्रांस, ब्रिटेन और ओमान की संयुक्त पहल से समुद्री मार्ग को सुरक्षित बनाए रखने की कोशिश की जा रही है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा कम होने की उम्मीद है।
अब आगे क्या?
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिलहाल कम होता दिखाई दे रहा है, लेकिन पश्चिम एशिया की परिस्थितियां अभी भी संवेदनशील बनी हुई हैं। इसी वजह से यूरोपीय देश किसी भी संभावित खतरे को देखते हुए पहले से तैयारी कर रहे हैं। यदि आने वाले दिनों में क्षेत्र में शांति बनी रहती है तो वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता आने की संभावना बढ़ेगी। वहीं किसी नए तनाव की स्थिति में यह नौसैनिक तैनाती अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
मुख्य बातें (Quick Highlights)
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| बड़ा कदम | फ्रांस और ब्रिटेन ने हॉर्मुज में समुद्री सुरक्षा बढ़ाई |
| फ्रांस की तैनाती | 2 माइनहंटर, 2 फ्रिगेट और 1 समुद्री गश्ती विमान |
| सहयोगी देश | ब्रिटेन और ओमान |
| उद्देश्य | समुद्री मार्ग को सुरक्षित रखना और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा |
| बड़ा बयान | जरूरत पड़ने पर बहुराष्ट्रीय मिशन भेजने को तैयार |
| वैश्विक असर | तेल और गैस सप्लाई चेन सुरक्षित रखने की कोशिश |