नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तीसरे दिन तेजी देखने को मिली है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड करीब 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा। ब्रेंट का यह स्तर जुलाई के अंत के बाद सबसे ऊंचे स्तरों में है। कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका-ईरान तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ता संकट है। बाजार को आशंका है कि लंबे समय तक जारी तनाव से वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ी तेल की चिंता
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष को खत्म करने के लिए बातचीत में कोई ठोस प्रगति नहीं होने से तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भी ईरान के साथ समझौते को लेकर जल्दबाजी नहीं दिखाने के संकेत मिले हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, अमेरिका-ईरान शांति समझौते की संभावनाएं कमजोर पड़ने और ईरान के अधिक आक्रामक रुख के कारण ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बाजार की चिंता बढ़ी है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना सबसे बड़ा चिंता का कारण
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इस रास्ते से तेल की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका सीधे अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव डालती है। मौजूदा तनाव के बीच इस मार्ग से टैंकरों की आवाजाही में तेज गिरावट दर्ज की गई है। रॉयटर्स के अनुसार, शनिवार को केवल पांच टैंकर इस रास्ते से गुजरे, जबकि रविवार को कोई टैंकर नहीं गुजरा। इससे बाजार में सप्लाई बाधित होने की आशंका और मजबूत हुई है। ईरान और ओमान के बीच होर्मुज से जुड़े किसी संभावित समाधान को लेकर बातचीत की खबरें हैं, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के चलते बाजार में फिलहाल अनिश्चितता बनी हुई है।
इस साल तेल की कीमतों में बड़ा उछाल
मध्य-पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण इस साल कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। सोमवार को ब्रेंट क्रूड करीब 2.65 प्रतिशत बढ़कर 90.87 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था, जबकि WTI 2.55 प्रतिशत बढ़कर 84.50 डॉलर पर पहुंचा था। मंगलवार को तेजी आगे बढ़ी और ब्रेंट करीब 91.14 डॉलर तथा WTI करीब 85.04 डॉलर तक पहुंच गया।
भारत पर क्या होगा असर?
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में भारत की क्रूड ऑयल इंपोर्ट डिपेंडेंसी करीब 87.8 प्रतिशत थी।
ऐसे में अगर ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 90 डॉलर से ऊपर बना रहता है, तो भारत के इंपोर्ट बिल, रुपये और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों के अलावा परिवहन लागत और कई अन्य वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर घरेलू पेट्रोल-डीजल के दाम पर तुरंत और उसी अनुपात में दिखे, यह जरूरी नहीं है। घरेलू ईंधन कीमतों पर टैक्स, तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति और अन्य कारक भी असर डालते हैं।
आगे किस बात पर रहेगी बाजार की नजर?
अब बाजार की नजर अमेरिका के आगामी क्रूड ऑयल इन्वेंट्री डेटा, होर्मुज से तेल टैंकरों की आवाजाही और अमेरिका-ईरान के बीच किसी संभावित कूटनीतिक पहल पर रहेगी। यदि मध्य-पूर्व तनाव और बढ़ता है तथा होर्मुज से सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो कच्चे तेल की कीमतों पर और दबाव बन सकता है। वहीं तनाव कम होने या तेल की आवाजाही सामान्य होने की स्थिति में कीमतों में राहत भी देखने को मिल सकती है।