रोमियो–जूलियट क्लॉज मूल रूप से ऐसा कानूनी अपवाद है, जिसमें उम्र के बहुत अधिक अंतर के बिना बने, आपसी सहमति वाले किशोर प्रेम संबंधों को आपराधिक श्रेणी से बाहर रखने की व्यवस्था होती है। कई देशों में यह क्लॉज इसलिए लाया गया ताकि टीनएज के स्वाभाविक भावनात्मक और शारीरिक रिश्तों को बलात्कार या यौन शोषण जैसे गंभीर अपराधों के बराबर न रखा जाए।
POCSO एक्ट का उद्देश्य और मौजूदा समस्या
प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस एक्ट, 2012 का मकसद बच्चों को यौन शोषण और हिंसा से बचाना था। लेकिन समय के साथ यह सामने आया है कि इस कानून का इस्तेमाल कई मामलों में सहमति से बने किशोर रिश्तों को अपराध घोषित करने या निजी दुश्मनी निकालने के लिए किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कानून का इरादा सही है, लेकिन उसका क्रियान्वयन कई बार बच्चों के ही खिलाफ खड़ा हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: कानून कहीं हथियार न बन जाए
9 जनवरी को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि POCSO जैसे सख्त कानून का अंधाधुंध इस्तेमाल एक “बेकार हथियार” में बदल सकता है। कोर्ट ने चिंता जताई कि जिस कानून को बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया, वही कानून कई बार उनके भविष्य को नुकसान पहुंचा रहा है, खासकर तब जब रिश्ते सहमति और करीबी उम्र के दायरे में हों।
जेनुइन किशोर रिश्तों के लिए कानूनी छूट की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह विचार करने को कहा कि क्या POCSO के सबसे कठोर प्रावधानों से वास्तविक किशोर प्रेम संबंधों को छूट दी जा सकती है। कोर्ट का मानना है कि रोमियो–जूलियट क्लॉज जैसे प्रावधान से कानून की नैतिक और कानूनी ताकत बनी रहेगी और उसका दुरुपयोग भी रुकेगा। साथ ही, झूठे या बदले की भावना से की गई शिकायतों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत भी रेखांकित की गई।
कानून का असर: जब सजा रिश्ते से बड़ी हो जाए
जुवेनाइल जस्टिस सिस्टम से जुड़ी आशियाना फाउंडेशन की डायरेक्टर साची मनियार का अनुभव इस समस्या की गंभीरता दिखाता है। एक मामले में 17 वर्षीय लड़का और 16 वर्षीय लड़की आपसी सहमति से रिश्ते में थे। शिकायत दर्ज होने पर लड़के को महीनों ऑब्जर्वेशन होम में रहना पड़ा। आज दोनों एक बच्चे के माता-पिता हैं, लेकिन पुराने केस की वजह से उनके बच्चे के स्कूल एडमिशन तक में दिक्कतें आ रही हैं। यह उदाहरण बताता है कि कानून का बोझ कई बार पीढ़ियों तक असर डाल सकता है।
संतुलन की जरूरत: सुरक्षा और संवेदनशीलता दोनों
POCSO जैसे कानूनों की सख्ती जरूरी है, लेकिन उतनी ही जरूरी है मानवीय संवेदनशीलता और सामाजिक यथार्थ की समझ। सुप्रीम कोर्ट की यह चर्चा दरअसल इसी संतुलन की ओर इशारा करती है—ताकि बच्चों को शोषण से भी बचाया जा सके और मासूम सहमति वाले रिश्तों को अपराधी ठप्पे से भी।
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