उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित माघ मेले के तीसरे स्नान पर्व मौनी अमावस्या को लेकर रविवार को संगम तट पर अभूतपूर्व जनसैलाब देखने को मिला। प्रशासनिक अनुमान के अनुसार, इस पावन अवसर पर लगभग चार करोड़ श्रद्धालुओं के त्रिवेणी संगम में स्नान करने की संभावना जताई गई। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना के लिहाज से भी विशेष महत्व रखता है।
रात से ही शुरू हुआ स्नान का सिलसिला
मौनी अमावस्या के स्नान के लिए श्रद्धालुओं का संगम क्षेत्र में आगमन शनिवार रात से ही शुरू हो गया था। रात 12 बजे के बाद से ही श्रद्धालुओं ने माँ गंगा के पवित्र जल में आस्था की डुबकी लगानी शुरू कर दी थी। प्रशासन के अनुसार, रविवार सुबह आठ बजे तक लगभग 1.3 करोड़ श्रद्धालु गंगा और संगम में स्नान कर चुके थे, जो इस पर्व की व्यापकता और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को दर्शाता है।
ठंड और कोहरे पर भारी पड़ी श्रद्धा
भीषण ठंड और घने कोहरे के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखाई दी। संगम तट पर हर आयु वर्ग के लोग—बुजुर्ग, महिलाएं और युवा—त्रिवेणी के पवित्र जल में स्नान करते नजर आए। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस दिन किया गया स्नान समस्त पापों का नाश करता है और जीवन को आध्यात्मिक शुद्धता प्रदान करता है।
मौनी अमावस्या का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में होते हैं। इस विशेष खगोलीय संयोग के कारण इस दिन मौन रहकर संगम में स्नान करने से सौ अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि साधु-संतों के साथ-साथ गृहस्थ श्रद्धालु भी इस दिन स्नान को अत्यंत फलदायी मानते हैं।
माघ मास और अमृत तुल्य गंगाजल की मान्यता
हिंदू धर्मग्रंथों में माघ मास को अत्यंत पवित्र माना गया है, लेकिन माघ मास के मध्य में आने वाली अमावस्या—मौनी अमावस्या—को विशेष स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि इस दिन माँ गंगा का जल अमृत के समान हो जाता है। इसलिए माघ स्नान के लिए इस तिथि को सर्वोत्तम माना गया है और संगम स्नान को मोक्षदायी बताया गया है।
सुरक्षा और व्यवस्थाओं में प्रशासन की सतर्कता
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन की ओर से सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। संगम क्षेत्र में पुलिस बल, एनडीआरएफ, स्वास्थ्य टीमें और स्वयंसेवक तैनात रहे। भीड़ नियंत्रण, यातायात व्यवस्था और आपात स्थितियों से निपटने के लिए विशेष निगरानी रखी गई, ताकि श्रद्धालु सुरक्षित रूप से स्नान और पूजा-अर्चना कर सकें।
आस्था का यह प्रवाह अनवरत है
मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर संगम तट पर उमड़ा यह जनसैलाब भारतीय सनातन परंपरा की जीवंतता और सामूहिक आस्था की शक्ति को दर्शाता है। आधुनिकता के दौर में भी करोड़ों लोगों का इस प्रकार एकत्र होना इस बात का प्रमाण है कि आस्था, संस्कार और परंपराएं आज भी जनमानस के केंद्र में हैं।
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