सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग की क्रीमी लेयर तय करते समय केवल आय को ही एकमात्र मानदंड नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या निजी क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के बच्चों के लिए क्रीमी लेयर निर्धारण के मानदंड सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के समान ही होने चाहिए। अदालत ने कहा कि समान सामाजिक वर्ग के लोगों के बीच कृत्रिम अंतर पैदा करना न्यायसंगत नहीं है।
केंद्र सरकार की अपीलों पर आया फैसला
यह निर्णय केंद्र सरकार द्वारा दायर अपीलों पर सुनाया गया है, जिसमें विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों को चुनौती दी गई थी। मद्रास, दिल्ली और केरल उच्च न्यायालयों ने पहले अपने-अपने निर्णयों में कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और सरकारी कर्मचारियों के लिए क्रीमी लेयर निर्धारण में अलग-अलग आय मानदंड अपनाना भेदभावपूर्ण है। इन फैसलों के खिलाफ केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय पहुंची थी।
आरक्षण का लाभ सही वर्ग तक पहुंचाने का उद्देश्य
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि क्रीमी लेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत उन्नत वर्ग आरक्षण के लाभ पर एकाधिकार न कर लें। अदालत ने कहा कि आरक्षण नीति का वास्तविक उद्देश्य उन समुदायों को अवसर देना है जो वास्तव में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं।
समान सामाजिक वर्ग में भेदभाव उचित नहीं
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि यदि एक ही सामाजिक वर्ग के लोगों के लिए अलग-अलग मानदंड लागू किए जाते हैं तो इससे असमानता उत्पन्न होती है। न्यायालय ने यह भी कहा कि समान परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के बीच कृत्रिम विभाजन पैदा करना संविधान की समानता की भावना के अनुरूप नहीं है।
सिविल सेवा परीक्षा से जुड़ा था मामला
यह मामला उन तीन अभ्यर्थियों से जुड़ा था जिन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में सफलता प्राप्त की थी। प्रमाणपत्रों के सत्यापन के दौरान उन्हें क्रीमी लेयर में वर्गीकृत कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और संबंधित उच्च न्यायालयों का दरवाजा खटखटाया। उच्च न्यायालयों ने उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग की गैर-क्रीमी लेयर श्रेणी में मानते हुए केंद्र सरकार को उनके पक्ष में निर्णय लेने का निर्देश दिया था।
फैसले का व्यापक प्रभाव
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय आरक्षण नीति के क्रियान्वयन पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे क्रीमी लेयर निर्धारण की प्रक्रिया अधिक संतुलित और न्यायसंगत बनने की संभावना है, जिससे वास्तव में वंचित वर्गों को आरक्षण का लाभ प्राप्त हो सकेगा।
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