नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में कथित बड़ी टूट के बाद राष्ट्रीय राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। टीएमसी के 20 बागी सांसदों द्वारा त्रिपुरा की छोटी राजनीतिक पार्टी नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का ऐलान किए जाने के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार और गृह मंत्री अमित शाह पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस का कहना है कि यह पूरा घटनाक्रम लोकसभा में एनडीए को दो-तिहाई बहुमत दिलाने की रणनीति का हिस्सा है और इससे लोकतांत्रिक व संवैधानिक परंपराओं को नुकसान पहुंच रहा है।
TMC के 20 सांसदों ने किया विलय का ऐलान
तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने अचानक बड़ा राजनीतिक कदम उठाते हुए एनसीपीआई में शामिल होने की घोषणा कर दी। इस फैसले ने पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी हलचल बढ़ा दी है। बागी सांसदों का दावा है कि उनका उद्देश्य पार्टी को नई दिशा देना और संगठन में सुधार लाना है, जबकि टीएमसी नेतृत्व इसे सीधा राजनीतिक विश्वासघात और दलबदल बता रहा है। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें शुरू हो गई हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि इसके पीछे सुनियोजित रणनीति काम कर रही है, जबकि बागी गुट इसे वैचारिक और संगठनात्मक फैसला बता रहा है।
जयराम रमेश का हमला, बोले- अमित शाह चला रहे पूरा खेल
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बयान जारी करते हुए आरोप लगाया कि गृह मंत्री अमित शाह लोकसभा में एनडीए के लिए दो-तिहाई बहुमत हासिल करना चाहते हैं और इसी मकसद से यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम तैयार किया गया है।
जयराम रमेश ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन वर्तमान परिस्थितियां इसके विपरीत दिखाई दे रही हैं। उन्होंने दावा किया कि इस तरह की राजनीतिक इंजीनियरिंग लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है और इससे संविधान की भावना को नुकसान पहुंच सकता है।
छोटी पार्टी NCPI अचानक चर्चा में क्यों?
इस विवाद के केंद्र में आई नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) त्रिपुरा की एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस पार्टी का राष्ट्रीय राजनीति में अब तक कोई बड़ा प्रभाव नहीं रहा है।
साल 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन बेहद सीमित रहा था। ऐसे में टीएमसी के 20 सांसदों का इसी पार्टी में विलय कई सवाल खड़े कर रहा है। कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि जिस पार्टी का जमीनी आधार बेहद कमजोर है, वह अचानक राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की स्थिति में कैसे पहुंच रही है।
टीएमसी के चुनाव चिन्ह पर भी बागी गुट की नजर
मामले को और दिलचस्प बनाते हुए बागी सांसदों ने अब टीएमसी के मूल चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक अधिकारों पर भी दावा करने के संकेत दिए हैं। बागी गुट के नेता अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि उनका उद्देश्य पार्टी को बचाना और उसमें सुधार करना है।
दूसरी ओर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मूल तृणमूल कांग्रेस ने इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि बागी सांसदों की कार्रवाई दलबदल विरोधी कानून की भावना के खिलाफ है और इसे कानूनी चुनौती दी जाएगी।
लोकसभा अध्यक्ष को दी गई विलय की जानकारी
सूत्रों के मुताबिक, रविवार को बागी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने एनसीपीआई में विलय संबंधी दस्तावेज और औपचारिक जानकारी सौंप दी। अब इस पूरे मामले पर संसदीय प्रक्रिया और कानूनी पहलुओं को लेकर नजरें टिकी हुई हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह विवाद आगे बढ़ता है तो मामला चुनाव आयोग, लोकसभा सचिवालय और न्यायालय तक भी पहुंच सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह राजनीतिक लड़ाई और अधिक तीखी होने की संभावना है।
दलबदल कानून और संवैधानिक बहस तेज
टीएमसी का कहना है कि सांसदों का यह कदम दलबदल विरोधी कानून के दायरे में आता है और इसकी वैधता पर गंभीर सवाल हैं। वहीं बागी गुट अपने कदम को वैधानिक और लोकतांत्रिक बता रहा है।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक दलों में टूट, विलय और सांसदों की निष्ठा से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों पर बहस छेड़ दी है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि लोकसभा अध्यक्ष, चुनाव आयोग और अन्य संस्थाएं इस मामले में क्या रुख अपनाती हैं।