कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक दशक से ज्यादा समय तक 'भत्ता' (Welfare Schemes) ही सत्ता की चाबी बना रहा, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों ने इस धारणा को जड़ से उखाड़ फेंका है। नवान्न (राज्य सचिवालय) से अब तृणमूल की विदाई हो चुकी है और 'लक्ष्मी भंडार' जैसी लोकप्रिय योजनाओं के बावजूद जनता ने बदलाव के लिए भाजपा पर भरोसा जताया है।
भत्ते से ज्यादा 'नौकरी' की भूख
इस बार का चुनाव 'भत्तों की रेस' जैसा लग रहा था। एक तरफ तृणमूल ने 'युवसाथी' जैसी नई सुविधाओं का लालच दिया, तो दूसरी तरफ भाजपा ने महिलाओं को 3,000 रुपये मासिक देने का वादा किया। लेकिन नतीजों ने साबित किया कि बंगाल का शिक्षित युवा अब चंद रुपयों की खैरात के बदले सम्मानजनक रोजगार चाहता है। सालों से धर्मतला पर धरने पर बैठे नौकरी के उम्मीदवारों और पहाड़ों जैसी बेरोजगारी ने ममता बनर्जी के 'भत्ता मॉडल' को फेल कर दिया।
सुरक्षा के सामने फीका पड़ा 'लक्ष्मी भंडार'
बंगाल की जिन महिलाओं को तृणमूल अपना सबसे बड़ा वोट बैंक मानती थी, उन्होंने भी इस बार सुरक्षा के सवाल पर वोट किया। आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं और राज्य में बढ़ते महिला अपराधों ने गृहणियों के मन में डर पैदा कर दिया था। पीएम मोदी और अमित शाह द्वारा उठाए गए नारी सुरक्षा के मुद्दे ने महिलाओं के मन में सीधे पैठ बनाई, जिससे भत्ते का लाभ लेने के बावजूद वोट भाजपा के खाते में गया।
भ्रष्टाचार और राहुल गांधी का प्रहार
चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि सरकारी कामों में 'कटमनी', स्थानीय नेताओं की दादागिरी और तोषण की राजनीति ने लोगों का दम घोंट दिया था। वहीं, राहुल गांधी द्वारा बेरोजगारी के मुद्दे पर ममता सरकार को घेरना भी कारगर रहा। उन्होंने सवाल उठाया था कि जिस सरकार ने लाखों नौकरियों का वादा किया था, उसने 84 लाख लोगों को भत्ते की लाइन में क्यों खड़ा कर दिया?
एक नए युग की शुरुआत
2026 के परिणाम स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि जनता के पेट की भूख और मन के आतंक का इलाज सिर्फ सरकारी चेक से नहीं किया जा सकता। 15 साल के 'दीदी-राज' के बाद बंगाल अब नई उम्मीदों के साथ 'सोनार बांग्ला' के पथ पर बढ़ने को तैयार है।