New Delhi | पितृ पक्ष 2026 में आज यानी 5 अक्टूबर, सोमवार को दशमी श्राद्ध किया जा रहा है। इसे कई स्थानों पर दसमी श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन दशमी तिथि को हुआ हो। परिवार के लोग पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण, पिंडदान और अन्य श्राद्ध कर्म करते हैं। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में श्राद्ध को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का माध्यम माना गया है। इसलिए इस दिन किए जाने वाले कर्मकांड में श्रद्धा और भाव को विशेष महत्व दिया जाता है।
दशमी श्राद्ध का क्या है महत्व?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को हुई हो, तो उसका वार्षिक पार्वण श्राद्ध दशमी तिथि को किया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करता है और परंपरा के अनुसार तर्पण तथा पिंडदान करता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध कर्म से पितरों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त होता है।
दशमी श्राद्ध 2026 का शुभ मुहूर्त
दशमी श्राद्ध के लिए दिन के कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल को महत्वपूर्ण माना जाता है। 5 अक्टूबर को प्रमुख समय इस प्रकार है:
| मुहूर्त | समय | अवधि |
|---|---|---|
| कुतुप मुहूर्त | सुबह 11:46 से दोपहर 12:33 बजे तक | 47 मिनट |
| रौहिण मुहूर्त | दोपहर 12:33 से 1:20 बजे तक | 47 मिनट |
| अपराह्न काल | दोपहर 1:20 से 3:41 बजे तक | 2 घंटे 21 मिनट |
श्राद्ध कर्म के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।
दशमी श्राद्ध की विधि क्या है?
दशमी श्राद्ध के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनने और पूजा स्थल को स्वच्छ करने की परंपरा है। इसके बाद पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्राद्ध कर्म का संकल्प लिया जाता है।
तर्पण
श्राद्ध कर्म में सबसे पहले पितरों का तर्पण किया जाता है। परंपरा के अनुसार जल में काले तिल मिलाकर पूर्वजों को जल अर्पित किया जाता है। तर्पण करते समय पूर्वज का नाम और गोत्र स्मरण करने की परंपरा है।
पिंडदान
तर्पण के बाद परंपरा के अनुसार पिंडदान किया जाता है। पिंड बनाने में सामान्यतः चावल, तिल और अन्य सामग्री का उपयोग किया जाता है। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में पिंडदान की विधि में अंतर हो सकता है।
श्राद्ध में भोजन और दान का महत्व
श्राद्ध कर्म के बाद भोजन कराने और दान देने की भी परंपरा है। कई परिवार अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को भोजन, कपड़े या उपयोगी वस्तुओं का दान अपनी क्षमता के अनुसार किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता में पितरों के नाम पर किया गया दान पुण्यदायी माना जाता है।
क्या दशमी श्राद्ध सिर्फ दशमी तिथि में मृत्यु वालों का होता है?
मुख्य रूप से दशमी श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए किया जाता है जिनका निधन दशमी तिथि को हुआ था। यह मृत्यु तिथि शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की दशमी हो सकती है। अगर किसी व्यक्ति को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं है या किसी कारण से संबंधित तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका, तो धार्मिक परंपराओं में सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करने का विकल्प भी बताया गया है।
पितरों के प्रति श्रद्धा को माना जाता है सबसे महत्वपूर्ण
पितृ पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध कर्म का मूल उद्देश्य धार्मिक परंपरा के अनुसार पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना है। इसलिए दशमी श्राद्ध के दिन तर्पण, पिंडदान, भोजन और दान जैसे कर्म अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार किए जा सकते हैं।
ध्यान दें: श्राद्ध के मुहूर्त और विधि में स्थान एवं पंचांग के अनुसार अंतर हो सकता है। किसी विशेष पारिवारिक परंपरा या धार्मिक विधि के लिए स्थानीय आचार्य/पंडित की सलाह लेना उचित है।