नई दिल्ली - पितृ पक्ष के दौरान आने वाली एकादशी तिथि का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन किए जाने वाले श्राद्ध को इंदिरा एकादशी श्राद्ध कहा जाता है। वर्ष 2026 में एकादशी श्राद्ध 6 अक्टूबर को किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि पर उन दिवंगत परिजनों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है, जिनका निधन किसी भी पक्ष की एकादशी तिथि को हुआ हो।
कब से कब तक रहेगी एकादशी तिथि?
पंचांग के अनुसार, 2026 में एकादशी तिथि 6 अक्टूबर की रात 2:07 बजे शुरू होगी और इसका समापन 7 अक्टूबर की रात 12:34 बजे होगा। हालांकि श्राद्ध कर्म के लिए केवल तिथि देखना ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि निर्धारित श्राद्ध मुहूर्त को भी ध्यान में रखा जाता है। इंदिरा एकादशी के अवसर पर पितरों का स्मरण करते हुए विधि-विधान से श्राद्ध, तर्पण और अन्य धार्मिक कर्म किए जाते हैं।
श्राद्ध के लिए खास मुहूर्त
6 अक्टूबर को श्राद्ध अनुष्ठान के लिए दिन में अलग-अलग मुहूर्त बताए गए हैं। कुतुप मुहूर्त सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक रहेगा। इसके बाद रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:33 बजे से 1:20 बजे तक रहेगा। वहीं अपराह्न काल दोपहर 1:20 बजे से 3:40 बजे तक रहने की जानकारी दी गई है। श्राद्ध कर्म करने वाले लोग अपनी परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार उपयुक्त समय का चयन कर सकते हैं।
किन पितरों के लिए किया जाता है श्राद्ध?
इंदिरा एकादशी श्राद्ध उन दिवंगत परिजनों के लिए किया जाता है, जिनकी मृत्यु एकादशी तिथि को हुई हो। धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि मृत्यु की तिथि के अनुसार पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म करने का विशेष महत्व होता है। इस दिन परिवार के सदस्य पितरों को याद करते हैं और उनकी आत्मिक शांति के लिए तर्पण तथा श्राद्ध कर्म करते हैं। कई परिवार अपनी कुल परंपरा के अनुसार ब्राह्मण भोजन, दान और अन्य धार्मिक कार्य भी करते हैं।
धार्मिक मान्यता में क्या है महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इंदिरा एकादशी के दिन श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों को शांति प्राप्त होती है। इसे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का अवसर भी माना जाता है। हालांकि, श्राद्ध और पितृ पक्ष से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक आस्था एवं परंपराओं पर आधारित हैं। इनके वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं किया जा सकता। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में श्राद्ध की विधि तथा मुहूर्त को लेकर परंपराओं में अंतर भी हो सकता है। इसलिए धार्मिक अनुष्ठान करने वाले लोग अपने स्थानीय पंचांग या विद्वान आचार्य से मुहूर्त और विधि की पुष्टि कर सकते हैं।