उत्तर प्रदेश की पंचायत व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रशासक नियुक्त किए जाने के सरकारी निर्णय पर अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया इस निर्णय पर संवैधानिक प्रश्न उठाते हुए इसे चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के संचालन में संविधान के प्रावधानों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अदालत का यह आदेश पंचायत प्रशासन और आगामी चुनाव प्रक्रिया दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
याचिका में सरकार के निर्णय को दी गई थी चुनौती
यह मामला अरविंद राठौर द्वारा दायर याचिका के माध्यम से न्यायालय के समक्ष पहुंचा था। याचिकाकर्ता का कहना था कि ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें ही प्रशासक नियुक्त करना संविधान की मूल भावना तथा पंचायत राज व्यवस्था के सिद्धांतों के विपरीत है। सुनवाई के दौरान इस बात पर भी जोर दिया गया कि पंचायतों का संचालन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए और कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था के लिए वैधानिक विकल्प अपनाए जाने चाहिए। अदालत ने इन तर्कों को गंभीरता से लेते हुए सरकार के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी।
चुनाव में देरी के कारण बनी थी अस्थायी व्यवस्था
उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो चुका है। प्रदेश की 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में समय पर चुनाव नहीं हो पाने के कारण राज्य सरकार ने मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति दी थी। सरकार का तर्क था कि नई पंचायतों के गठन तक प्रशासनिक कार्य प्रभावित न हों, इसलिए यह अंतरिम व्यवस्था आवश्यक थी। हालांकि इस निर्णय के विरुद्ध दायर याचिका के बाद अब पंचायत प्रशासन की मौजूदा व्यवस्था न्यायिक परीक्षण के दायरे में आ गई है।
ओबीसी आयोग की रिपोर्ट बनेगी चुनावी प्रक्रिया का आधार
मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई के समय ओबीसी आयोग की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की जाए। सरकार पहले ही पिछड़ा वर्ग आरक्षण के निर्धारण के लिए आयोग का गठन कर चुकी है। आयोग प्रदेश के विभिन्न जिलों का दौरा कर सामाजिक और जनसंख्या संबंधी आंकड़ों का अध्ययन कर रहा है। इसी रिपोर्ट के आधार पर पंचायत चुनावों में आरक्षण की नई व्यवस्था तय की जाएगी, जिसके बाद ही चुनाव कार्यक्रम घोषित होने की संभावना है।
पंचायत चुनाव की समयसीमा पर बनी अनिश्चितता
ओबीसी आयोग की रिपोर्ट तैयार होने और आरक्षण प्रक्रिया पूरी होने तक पंचायत चुनावों में कुछ महीनों की देरी की संभावना जताई जा रही है। चुनाव आयोग से भी अदालत ने आगामी सुनवाई में चुनाव कार्यक्रम के संबंध में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। यदि आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं होती है तो पंचायत चुनाव निर्धारित समय से आगे खिसक सकते हैं। इससे प्रदेश की स्थानीय स्वशासन व्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
नई मतदाता सूची से चुनावी तस्वीर बदली
हाल ही में राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत चुनावों के लिए अंतिम मतदाता सूची भी प्रकाशित की है। नई सूची के अनुसार प्रदेश में अब पंचायत चुनाव के लिए 12 करोड़ 58 लाख से अधिक मतदाता पंजीकृत हैं। इस बार लगभग 1.81 करोड़ नए मतदाताओं के नाम भी सूची में शामिल किए गए हैं, जिससे चुनावी परिदृश्य पहले की तुलना में काफी व्यापक हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे ही आरक्षण प्रक्रिया पूरी होगी और चुनाव कार्यक्रम घोषित होगा, प्रदेश में व्यापक स्तर पर पंचायत चुनावी गतिविधियां शुरू हो जाएंगी।