अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के मामले ने राजनीतिक रंग पकड़ लिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला ने आरोप लगाया कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मामले में केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि यह जांच होनी चाहिए कि इतनी बड़ी कथित अनियमितता बिना उच्च स्तर की जानकारी या मिलीभगत के कैसे संभव हुई। उन्होंने दावा किया कि श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए नकद चढ़ावे और आभूषणों के रिकॉर्ड को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग
कांग्रेस ने पूरे मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उच्चतम न्यायालय की निगरानी में जांच कराने की मांग की है। राजीव शुक्ला ने कहा कि यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था और विश्वास से जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार, यदि जांच सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में होगी तो तथ्यों की निष्पक्ष पड़ताल हो सकेगी और वास्तविक जिम्मेदार लोगों तक कार्रवाई पहुंच पाएगी।
राम मंदिर ट्रस्ट के पुनर्गठन की भी उठी मांग
कांग्रेस ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को भंग कर उसके पुनर्गठन की भी मांग की है। पार्टी का कहना है कि ट्रस्ट में राजनीतिक व्यक्तियों के बजाय संत-महात्माओं, धर्माचार्यों और धार्मिक क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठित लोगों को स्थान दिया जाना चाहिए। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मंदिरों के न्यासों पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, जिससे धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
एसआईटी जांच और आठ आरोपियों की गिरफ्तारी
इस पूरे प्रकरण में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की शिकायत पर आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इसके बाद पुलिस ने सभी नामजद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर 13 जून को विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। एसआईटी में प्रशासन, पुलिस और वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया है, जो मामले की विस्तृत जांच कर रहे हैं।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच जांच पर टिकी निगाहें
राम मंदिर से जुड़ा यह मामला अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। एक ओर कांग्रेस निष्पक्ष और न्यायिक निगरानी वाली जांच की मांग कर रही है, तो दूसरी ओर राज्य सरकार पहले ही एसआईटी के माध्यम से जांच शुरू करा चुकी है। ऐसे में अब सभी की निगाहें एसआईटी की रिपोर्ट और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित अनियमितताओं के लिए कौन जिम्मेदार है और आगे क्या कार्रवाई होती है।