कोलकाता: राज्यसभा में केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ किए जाने से जुड़े विधेयक पर चर्चा के दौरान पश्चिम बंगाल के नाम का मुद्दा भी सामने आया। पश्चिम बंगाल से भाजपा के राज्यसभा सांसद और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने राज्य के नाम को लेकर अपनी राय रखते हुए कहा कि इसे केवल ‘बंगाल’ किए जाने के बजाय ‘पश्चिम बंग’ या ‘पश्चिम बंगाल’ रखा जाना चाहिए। शमिक भट्टाचार्य ने अपने तर्क को 1947 के विभाजन और पश्चिम बंगाल के गठन से जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम से जोड़ा। उन्होंने कहा कि राज्य का नाम केवल प्रशासनिक पहचान नहीं, बल्कि इसके पीछे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ भी जुड़ा हुआ है।
केरलम विधेयक पर चर्चा से उठा पश्चिम बंगाल का मुद्दा
राज्यसभा में केरल का नाम ‘केरलम’ किए जाने के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान शमिक भट्टाचार्य ने विधेयक का समर्थन किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को बधाई दी। इसी दौरान तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘बंगाल’ करने के लिए राज्य विधानसभा द्वारा भेजे गए प्रस्ताव का मुद्दा उठाया। इसके जवाब में शमिक भट्टाचार्य ने कहा कि किसी नाम को केवल विधानसभा में बहुमत के आधार पर बदलना उचित नहीं होगा, खासकर तब जब उससे राज्य के इतिहास और पहचान का सवाल जुड़ा हो।
1947 के विभाजन का दिया हवाला
अपने भाषण में भाजपा सांसद ने 20 जून 1947 की घटनाओं का उल्लेख करते हुए पश्चिम बंगाल के गठन और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका को रेखांकित किया। उनका तर्क था कि ‘पश्चिम बंगाल’ नाम 1947 के विभाजन के दौर की ऐतिहासिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि उस समय बंगाली हिंदुओं के लिए अलग राज्य की मांग और उसके पीछे की परिस्थितियों को नजरअंदाज करके सिर्फ ‘बंगाल’ नाम रखना उस इतिहास को कमजोर करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य का आधिकारिक नाम हिंदी, अंग्रेजी और बंगाली समेत सभी भाषाओं में एक समान रखा जाना चाहिए। उनकी ओर से ‘पश्चिम बंग’ या ‘पश्चिम बंगाल’ नाम का विकल्प रखा गया।
‘वंदे मातरम’ और बंगाल के सांस्कृतिक इतिहास का जिक्र
शमिक भट्टाचार्य ने अपने संबोधन में बंगाल के सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास का भी उल्लेख किया। उन्होंने ‘वंदे मातरम’ और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचनाओं से जुड़े पुराने विवादों का जिक्र करते हुए कहा कि बंगाल के इतिहास में ऐसे कई प्रसंग हैं, जिन्हें वर्तमान राजनीतिक बहस से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े मुजफ्फर अहमद की आत्मकथा का संदर्भ देते हुए ‘वंदे मातरम’ और ‘आनंदमठ’ को लेकर अतीत में व्यक्त की गई आपत्तियों का भी उल्लेख किया।
पटना और बख्तियारपुर के नाम बदलने का समर्थन
राज्यसभा की बहस के दौरान शमिक भट्टाचार्य ने अन्य ऐतिहासिक स्थानों के नाम बदलने की मांगों का भी समर्थन किया। उन्होंने बिहार की राजधानी पटना का नाम बदलकर उसके प्राचीन नाम पाटलिपुत्र किए जाने की मांग का समर्थन किया। इसके अलावा उन्होंने नालंदा जिले के बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन का नाम बदलने की मांग का भी समर्थन किया।
नाम बदलने की बहस फिर चर्चा में
शमिक भट्टाचार्य की टिप्पणी के बाद पश्चिम बंगाल के नाम को लेकर पुरानी राजनीतिक बहस एक बार फिर राष्ट्रीय मंच पर आ गई है। जहां भाजपा इसे राज्य के ऐतिहासिक संदर्भ और पहचान से जोड़ रही है, वहीं ‘बंगाल’ नाम को लेकर पहले से ही अलग राजनीतिक मत मौजूद रहे हैं।