कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई की रात एक युग के अंत की गवाह बनी। जिसे कभी 'अजेय' माना जाता था, उस भवानीपुर की 'अपनी बेटी' ममता बनर्जी को अपने ही घर में हार का सामना करना पड़ा है। चुनाव आयोग और मतदाता सूची से नाम कटने जैसे मुद्दों पर 'अकेले लड़ने' का दम भरने वाली ममता बनर्जी को भाजपा के सुवेंदु अधिकारी ने 15,105 मतों के अंतर से पराजित कर दिया।
भवानीपुर में ऐसे टूटा 'अभेद्य' किला
शाखावत मेमोरियल मतगणना केंद्र पर सुबह से चल रही हाद्डाहाड्डी लड़ाई रात होते-होते 'ट्रैजिक' मोड़ पर समाप्त हुई। 20 राउंड की गिनती के बाद:
ममता बनर्जी: 58,349 वोट
सुवेंदु अधिकारी: 73,463 वोट
2011 से अब तक भवानीपुर में टीएमसी का कोई भी उम्मीदवार नहीं हारा था, लेकिन 2026 में इतिहास बदल गया।
हार के तीन बड़े कारण: शाह की रणनीति और 'साइलेंट' वोटर
विश्लेषकों के अनुसार, ममता की इस हार के पीछे तीन प्रमुख कारक रहे:
1. अबांगाली मतदाता: भवानीपुर में रहने वाले गैर-बंगाली मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा इस बार पूरी तरह भाजपा के पक्ष में लामबंद दिखा।
2. एलीट हाउसिंग कॉम्प्लेक्स: इलाके के आलीशान अपार्टमेंट्स में रहने वाले उच्च-मध्यम वर्ग ने ममता के व्यक्तिगत जनसंपर्क के बावजूद भाजपा को चुना।
3. अमित शाह का माइक्रो-मैनेजमेंट: जहां ममता सड़कों पर चाय की चौपाल लगा रही थीं, वहीं अमित शाह ने कम से कम 50 बड़े हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में गुप्त रूप से प्रभावी जनसंपर्क कर वोटों का रुख मोड़ दिया।
'बाघिनी' की राजनीतिक ढलान?
1984 में सोमनाथ चटर्जी को हराकर जो सफर शुरू हुआ था, वह 2026 में भवानीपुर की सड़कों पर ठहर गया है। ममता बनर्जी, जिन्होंने जीवन भर संघर्ष को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया, आज एक 'ट्रैजिक नायिका' के रूप में उभर रही हैं। हार के बाद राज्य की राजनीति में एक बड़ा 'इंद्रपतन' (महान हस्ती का पतन) देखा जा रहा है।