कोलकाता: करीब दो दशक बाद कोलकाता पहुंचीं चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन की वापसी ने साहित्य और राजनीति, दोनों क्षेत्रों में नई चर्चा छेड़ दी है। शहर पहुंचने पर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया। लंबे समय बाद बंगाल लौटने को लेकर तसलीमा ने भी भावुक प्रतिक्रिया दी और इसे अपने लिए बेहद खास पल बताया।
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने किया स्वागत
तसलीमा नसरीन की बंगाल वापसी पर मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने भी उनका स्वागत किया। उन्होंने कहा कि अब बंगाल में ऐसा माहौल है जहां तसलीमा बिना किसी भय के आ-जा सकती हैं। उनके इस बयान के बाद तसलीमा की वापसी राजनीतिक बहस का भी हिस्सा बन गई।
रवींद्र सदन में सम्मान समारोह बना चर्चा का केंद्र
तसलीमा नसरीन के सम्मान में रवींद्र सदन में आयोजित कार्यक्रम में साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की शुरुआत शांत माहौल में हुई, लेकिन बाद में एक घटनाक्रम ने पूरे समारोह का रुख बदल दिया। कुछ समय के लिए कार्यक्रम भी बाधित करना पड़ा।
जय गोस्वामी को मंच पर बुलाने के बाद शुरू हुआ विरोध
अपने संबोधन के दौरान तसलीमा नसरीन ने वरिष्ठ कवि जय गोस्वामी को मंच पर आमंत्रित किया। जैसे ही वह अपनी सीट से उठकर मंच की ओर बढ़े, दर्शकों के एक वर्ग ने विरोध जताना शुरू कर दिया। विरोध बढ़ता देख जय गोस्वामी ने मंच तक जाने के बजाय वापस अपनी सीट पर लौटना ही उचित समझा।
कुछ देर के लिए थम गया कार्यक्रम
दर्शकों के शोर-शराबे के कारण तसलीमा नसरीन को अपना भाषण बीच में रोकना पड़ा। आयोजकों ने लगातार लोगों से संयम बनाए रखने की अपील की। बाद में माहौल शांत होने पर कार्यक्रम दोबारा शुरू हुआ और सम्मान समारोह पूरा किया गया।
तसलीमा बोलीं- किसी लेखक का अपमान ठीक नहीं
घटना के बाद तसलीमा नसरीन ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन किसी साहित्यकार का सार्वजनिक अपमान उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि जय गोस्वामी को सम्मान के साथ मंच पर बुलाया गया था और उनके साथ जो हुआ, उससे उन्हें व्यक्तिगत रूप से दुख पहुंचा।
अभिव्यक्ति की आजादी पर भी रखी अपनी बात
अपने संबोधन में तसलीमा नसरीन ने कहा कि उन्होंने हमेशा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और कट्टरता के विरोध में अपनी बात रखी है। उनका मानना है कि लोकतांत्रिक समाज में असहमति का सम्मान होना चाहिए और संवाद ही हर मतभेद का सबसे बेहतर रास्ता है।
साहित्य से राजनीति तक छिड़ी नई बहस
रवींद्र सदन की घटना के बाद साहित्यिक और राजनीतिक हलकों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहा है, जबकि दूसरा पक्ष कार्यक्रम के दौरान हुए विरोध पर सवाल उठा रहा है। तसलीमा नसरीन की यह यात्रा अब केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रही, बल्कि राज्य की समकालीन राजनीति और सामाजिक विमर्श का भी महत्वपूर्ण विषय बन गई।