भोपाल, स्वास्थ्य सेवाओं के लिए संसाधन जुटाने में नाकाम सरकार ने जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और सिविल अस्पतालों तक के निजीकरण का फैसला किया है। पहले 10 जिला अस्पतालों को निजी मेडिकल कॉलेज बनाने वाली एजेंसी को देने का फैसला किया गया अब 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और 51 सिविल अस्पतालों को भी आउटसोर्स से संचालित करने की तैयारी है।
आयुष्मान कार्ड धारकों और बीपीएल मरीजों को नि:शुल्क इलाज देने की बात कही जा रही है, लेकिन निजीकरण के बाद गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों को सशुल्क ही इलाज कराना होगा। नि:शुल्क प्रसव और राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों का क्रियान्वयन भी प्रभावित होने की आशंका है। प्रदेश के विभिन्न संगठनों ने ही निजीकरण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
नीति आयोग के 1 जनवरी 2020 के प्रस्ताव के आधार पर मप्र सरकार ने निजीकरण का फैसला लिया है, जबकि 2020 में विभिन्न राज्यों के साथ मप्र सरकार ने भी विरोध किया था। अब मेडिकल कॉलेज स्थापित करने मॉडल रियायत समझौते में कहा गया है कि जिला अस्पतालों को निजी संस्थानों को सौंपा जाएगा। मप्र सरकार ने आयोग से एक कदम आगे बढ़कर जिला अस्पतालों का प्रबंधन भी निजी हाथों में सौंपने का फैसला किया है, जबकि आयोग के प्रस्ताव में निजी संस्था को जिला अस्पतालों के उन्नयन, संचालन और मेंटेनेंस सौंपने की बात कही गई है। स्वास्थ्य विभाग ने प्रबंधन भी जोड़ दिया है।
स्वास्थ्य सेवाओं के लिए संसाधन जुटाने में नाकाम सरकार ने जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और सिविल अस्पतालों तक के निजीकरण का फैसला किया है
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