इंदौर. मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ में जारी सुनवाई के दौरान अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से स्पष्ट रूप से पूछा है कि अब तक किए गए सर्वे और खुदाई में क्या तथ्य सामने आए हैं।
धार्मिक स्वरूप पर केंद्रित बहस
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एके चितले ने दलील दी कि पूरी भोजशाला विवादित नहीं है, बल्कि इसका केवल एक सीमित हिस्सा ही विवाद का विषय है। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान व्यवस्था के तहत मंगलवार को पूजन और शुक्रवार को नमाज की प्रक्रिया चल रही है, जिससे सामान्य दिनों में कोई समस्या नहीं होती।
त्योहारों के समय बढ़ती संवेदनशीलता
अदालत में यह मुद्दा भी उठाया गया कि जब बसंत पंचमी जैसे विशेष पर्व शुक्रवार को पड़ते हैं, तब स्थिति अधिक संवेदनशील हो जाती है और धार्मिक सौहार्द पर असर पड़ सकता है। इसी कारण इस मामले का स्पष्ट समाधान आवश्यक बताया गया।
एक साथ कई याचिकाओं पर सुनवाई
इस मामले से जुड़ी चार याचिकाएं और एक अपील पर छह अप्रैल से नियमित रूप से संयुक्त सुनवाई चल रही है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद ही अंतिम निर्णय की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा।
एएसआई से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की भूमिका इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि सर्वेक्षण संस्था को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी और यह बताना होगा कि खुदाई के दौरान क्या महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं, क्योंकि सभी पक्ष अपने-अपने तर्कों में इसी रिपोर्ट का हवाला दे रहे हैं।
हस्तक्षेप आवेदन को किया खारिज
सुनवाई के दौरान एक नए आवेदक ने मामले में हस्तक्षेप की अनुमति मांगी, लेकिन अदालत ने इसे अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि यदि इस प्रकार लगातार नए हस्तक्षेप स्वीकार किए गए, तो सुनवाई अनंत समय तक चलती रहेगी और निर्णय में देरी होगी।
अंतिम चरण की ओर बढ़ती सुनवाई
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिवक्ता की बहस पूरी होने के बाद अन्य पक्षकारों और अंत में एएसआई को सुना जाएगा। इससे संकेत मिलता है कि मामला अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है और जल्द ही महत्वपूर्ण निर्णय सामने आ सकता है।
संवेदनशील मुद्दे पर संतुलन की चुनौती
भोजशाला का यह मामला केवल ऐतिहासिक या धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में अदालत के सामने चुनौती यह है कि वह सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित और न्यायपूर्ण निर्णय दे।