देश के कई हिस्सों में स्वच्छ पानी और सफाई की व्यवस्था अभी भी भरोसेमंद नहीं हो पाई है। दूषित पानी के कारण फैलने वाली बीमारियाँ आज भी अस्पतालों में बढ़ते मरीजों का बड़ा कारण हैं। शहरी क्षेत्रों में पुरानी पाइपलाइनें और ग्रामीण इलाकों में असुरक्षित जलस्रोत लोगों के लिए खतरा बने हुए हैं। साफ पानी तक सबकी बराबर पहुँच सुनिश्चित करना अब सरकार और समाज—दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी बन चुका है।
नीतियां मजबूत, लेकिन जमीनी क्रियान्वयन कमजोर
काग़ज़ी घोषणाओं और वास्तविक स्थिति के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। स्वच्छता मिशन, सीवेज ट्रीटमेंट और ड्रेनेज सुधार जैसे प्रोजेक्ट तो चल रहे हैं, लेकिन कई शहरों और कस्बों में सीवेज अब भी खुले में बहता है। फंडिंग, मॉनिटरिंग और जवाबदेही की कमी के कारण कई योजनाएँ केवल फाइलों तक सीमित रह जाती हैं। इससे नागरिकों के मन में प्रशासनिक दक्षता को लेकर सवाल खड़े होते हैं।
कचरा डंपिंग—पर्यावरण पर बढ़ता बोझ
महानगरों के बाहर कचरे के ‘पहाड़’ अब नई पर्यावरणीय चुनौती बन चुके हैं। खुले में पड़ा कचरा ज़हरीली गैसें छोड़ता है और इसके रिसाव से मिट्टी व जल स्रोत प्रदूषित हो जाते हैं। प्लास्टिक, मेडिकल वेस्ट और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का अलग प्रबंधन न होना संकट को और गहरा कर देता है। रीसाइक्लिंग और सेग्रिगेशन व्यवस्था को मजबूत करना समय की जरूरत है।
बीमारियों का बोझ—गरीबों पर सबसे ज्यादा असर
जहां गंदगी और सीवेज का जमाव होता है, वहां डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड और त्वचा रोग तेजी से फैलते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार इलाज पर भारी खर्च नहीं उठा पाते और बीमारी उनके लिए आर्थिक संकट का कारण बन जाती है। स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच इस समस्या को और गंभीर बना देती है। स्वस्थ समाज तभी संभव है जब स्वच्छता हर व्यक्ति तक समान रूप से पहुंचे।
नागरिक जिम्मेदारी—सिर्फ सरकार पर निर्भरता नहीं चलेगी
अक्सर लोग कचरा सड़क पर फेंक देते हैं, नालियाँ जाम कर देते हैं और फिर गंदगी के लिए प्रशासन को दोषी ठहराते हैं। स्वच्छता सिर्फ सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन भी है। यदि नागरिक अपना कचरा सही तरीके से फेंकें और सार्वजनिक स्थानों को साफ रखें, तो शहरों की तस्वीर बदल सकती है। स्वच्छता को आदत और नैतिक जिम्मेदारी बनाना बेहद जरूरी है।
समाधान—तकनीक, पारदर्शिता और जनभागीदारी
मजबूत कचरा प्रबंधन प्रणाली, आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट और डिजिटल निगरानी तंत्र अपनाने से व्यवस्था प्रभावी बन सकती है। स्कूलों में स्वच्छता शिक्षा, सामुदायिक भागीदारी और पारदर्शी रिपोर्टिंग सिस्टम सुधार की गति को तेज़ कर सकते हैं। जब तकनीक, प्रशासन और नागरिक एक साथ काम करेंगे, तभी स्वच्छ और स्वस्थ समाज की स्थापना संभव होगी।
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