कोलकाता डेस्क: बंगाल की दुर्गा पूजा आज सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं रह गई है। यह कला, संस्कृति, परंपरा, सामाजिक मेल-जोल और सामुदायिक उत्सव का ऐसा रूप ले चुकी है, जिसकी पहचान अब कोलकाता से लेकर दुनिया के कई हिस्सों तक है। लेकिन जिस दुर्गोत्सव को आज हम बड़े-बड़े पंडालों, आकर्षक प्रतिमाओं, रोशनी और लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच देखते हैं, उसकी शुरुआत आखिर कब और कहां से हुई? इस सवाल का जवाब उतना सीधा नहीं है, क्योंकि बंगाल में दुर्गा पूजा की शुरुआत को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक और पारंपरिक मत मिलते हैं।
क्या 16वीं सदी में शुरू हुई थी बंगाल की भव्य दुर्गा पूजा?
एक प्रचलित ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार बंगाल में बड़े स्तर पर शारदीय दुर्गा पूजा की परंपरा 16वीं सदी में मजबूत हुई। इसका संबंध वर्तमान बांग्लादेश के राजशाही क्षेत्र के ताहिरपुर के राजा कंसनारायण से जोड़ा जाता है। एक कथा के अनुसार उन्होंने अपने क्षेत्र में बेहद भव्य तरीके से देवी दुर्गा की पूजा का आयोजन कराया था। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट में इसे 1576 के आसपास की परंपरा से जोड़ा गया है, जबकि दूसरे स्रोतों में इसकी तारीख 1480 तक बताई गई है। यानी यहां भी इतिहास और लोकपरंपरा के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
राजा कंसनारायण से जुड़ी क्या है कहानी?
प्रचलित कथा के मुताबिक राजा कंसनारायण एक भव्य धार्मिक अनुष्ठान करना चाहते थे। विद्वानों से सलाह लेने के बाद शारदीय दुर्गा पूजा को उस समय एक बड़े धार्मिक आयोजन के रूप में चुना गया। इसके बाद ताहिरपुर में देवी दुर्गा की भव्य आराधना की गई। इसी परंपरा को आगे चलकर बंगाल में बड़े पैमाने पर होने वाली दुर्गा पूजा के शुरुआती पड़ावों में गिना जाने लगा। हालांकि इस घटना की सटीक तारीख और इसे “बंगाल की पहली दुर्गा पूजा” कहे जाने को लेकर स्रोतों में मतभेद मौजूद हैं।
क्या कंसनारायण से भी पहले होती थी दुर्गा पूजा?
यहीं से इस इतिहास की एक दूसरी परत सामने आती है। दुर्गा की आराधना बंगाल में कंसनारायण के समय से अचानक शुरू हुई हो, ऐसा कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार बंगाल में दुर्गा पूजा की परंपरा के प्रमाण मध्यकाल तक जाते हैं और कुछ विद्वान इसकी जड़ें 11वीं सदी तक मानते हैं। बाद में बंगाल में शारदीय यानी शरद ऋतु में होने वाली पूजा ने एक अलग पहचान बनाई।
शारदीय दुर्गा पूजा का संबंध भगवान राम से कैसे जुड़ा?
दुर्गा पूजा की शारदीय परंपरा को रामायण की एक प्रसिद्ध कथा से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि लंका पर चढ़ाई से पहले भगवान राम ने देवी दुर्गा की आराधना की थी और शक्ति का आह्वान किया था। इसी वजह से शरद ऋतु में होने वाली इस पूजा को ‘अकाल बोधन’ की परंपरा से जोड़ा जाता है। धार्मिक ग्रंथों और उनकी रचना-तिथि को लेकर विद्वानों में अलग-अलग मत हैं, इसलिए इस कथा को धार्मिक परंपरा के संदर्भ में देखना अधिक उचित है।
बंगाल में दुर्गा पूजा का स्वरूप कैसे बदला?
शुरुआती दौर में दुर्गा पूजा मुख्य रूप से राजपरिवारों, जमींदारों और संपन्न परिवारों से जुड़ा आयोजन रही। समय के साथ यह सामाजिक प्रतिष्ठा और सामर्थ्य के प्रदर्शन का माध्यम भी बनी। खासकर 18वीं और 19वीं सदी में बंगाल के जमींदार परिवारों की भव्य दुर्गा पूजा ने इस परंपरा को नया स्वरूप दिया। ब्रिटिश शासन के दौरान कोलकाता में उभरते नए संपन्न वर्ग और जमींदारों ने भी दुर्गोत्सव को बड़े सार्वजनिक आयोजन में बदलने में भूमिका निभाई।

1610 में कोलकाता में पहली दुर्गा पूजा?
कोलकाता की दुर्गा पूजा के इतिहास में 1610 का साल भी खास माना जाता है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार कोलकाता में पहली दुर्गा पूजा का श्रेय लक्ष्मीकांत मजूमदार को दिया जाता है, जो सबर्ण रॉय चौधरी परिवार से जुड़े थे। उस समय आज का कोलकाता शहर अपने मौजूदा स्वरूप में अस्तित्व में नहीं था। कोलिकाता, सुतानुटी और गोविंदपुर जैसे गांवों के विकास से आगे चलकर आधुनिक कोलकाता का निर्माण हुआ।
1606 में भवानींद मजूमदार की पूजा का भी मिलता है उल्लेख
एक अन्य परंपरा के अनुसार नदीया के जमींदार भवानींद मजूमदार ने 1606 में अपने घर पर दुर्गा पूजा आयोजित की थी। इस दावे का उल्लेख कोलकाता की शुरुआती दुर्गा पूजा के इतिहास पर लिखे गए कई स्रोतों में मिलता है। इसलिए “बंगाल में सबसे पहली पूजा” और “कोलकाता में पहली पूजा” को एक ही सवाल मानना इतिहास को सरल बनाना होगा। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों से जुड़ी परंपराएं अपने-अपने दावे पेश करती हैं।
शोभाबाजार राजबाड़ी और 1757 की दुर्गा पूजा
कोलकाता की दुर्गा पूजा की चर्चा शोभाबाजार राजबाड़ी के बिना अधूरी मानी जाती है। राजा नवकृष्ण देव की पूजा 1757 से जुड़ी हुई है और पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग भी शोभाबाजार राजबाड़ी की दुर्गा पूजा की शुरुआत इसी वर्ष से बताता है। यह पूजा आगे चलकर कोलकाता की ऐतिहासिक ‘कंपनी पूजा’ के नाम से चर्चित हुई।
क्या रॉबर्ट क्लाइव के लिए हुई थी पहली शोभाबाजार पूजा?
शोभाबाजार की पूजा से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कहानियों में एक रॉबर्ट क्लाइव और नवकृष्ण देव की कहानी है। इसके अनुसार 1757 के प्लासी युद्ध के बाद क्लाइव भव्य समारोह करना चाहते थे और नवकृष्ण देव ने उनके लिए दुर्गा पूजा का आयोजन किया। हालांकि इतिहास पर शोध करने वाले स्रोत इस कहानी के कई हिस्सों पर सवाल उठाते हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार क्लाइव और नवकृष्ण देव की 1757 से पहले की निकटता का ठोस प्रमाण नहीं मिलता और 1757 में पूजा होने का प्रत्यक्ष प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय लोकप्रिय परंपरा और कथा के रूप में देखना ज्यादा उचित है।

राजबाड़ी से बारोवारी और फिर सर्वजन तक पहुंची पूजा
दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी सामाजिक यात्रा शायद यहीं से शुरू होती है। कभी जो पूजा राजपरिवारों और बड़े जमींदार घरानों तक सीमित थी, वह धीरे-धीरे आम लोगों की भागीदारी वाला उत्सव बन गई। 20वीं सदी की शुरुआत में कोलकाता में बारोवारी और बाद में सर्वजनिन पूजा का विस्तार हुआ। 1910 में भवानीपुर के बलराम बोस घाट स्ट्रीट पर सनातन धर्मोत्साहिनी सभा की पूजा को शुरुआती बारोवारी आयोजनों में गिना जाता है। इसके बाद बागबाजार समेत कई इलाकों में सर्वजनिन दुर्गोत्सव ने अपनी जगह बनाई।
महिषासुरमर्दिनी की आराधना से संस्कृति के सबसे बड़े उत्सव तक
दुर्गा पूजा की मूल धार्मिक भावना देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध और बुराई पर शक्ति की विजय से जुड़ी है। लेकिन बंगाल में इस पूजा ने धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़कर सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान हासिल की। आज पूजा के दौरान प्रतिमा निर्माण से लेकर पंडाल कला, रोशनी, संगीत, साहित्य और खान-पान तक, बंगाल की पूरी सांस्कृतिक विविधता इसमें दिखाई देती है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार कोलकाता की आधुनिक दुर्गा पूजा में ‘थीम पूजा’ ने भी रचनात्मकता का एक नया आयाम जोड़ा है।
तो आखिर बंगाल की पहली दुर्गा पूजा कब हुई?
अगर सवाल यह है कि देवी दुर्गा की आराधना बंगाल में पहली बार कब शुरू हुई, तो इसका कोई एक सर्वमान्य साल बताना मुश्किल है। दुर्गा उपासना की जड़ें इससे कहीं पुरानी मानी जाती हैं। अगर सवाल बड़े और भव्य शारदीय दुर्गोत्सव की परंपरा का है, तो 16वीं सदी में राजा कंसनारायण से जुड़ी ताहिरपुर की कथा सबसे ज्यादा चर्चित है। वहीं 1606 की भवानींद मजूमदार पूजा और 1610 में लक्ष्मीकांत मजूमदार से जुड़ी पूजा को बंगाल और कोलकाता की शुरुआती पारिवारिक दुर्गा पूजा परंपराओं में महत्वपूर्ण माना जाता है।
इतिहास से आज तक जारी है वही आस्था
बंगाल की दुर्गा पूजा का इतिहास किसी एक राजा, एक परिवार या एक साल की कहानी नहीं है। यह कई सदियों में विकसित हुई परंपराओं का संगम है। ताहिरपुर के राजा कंसनारायण की कथा हो, नदीया के मजूमदार परिवार की परंपरा, कोलकाता के सबर्ण रॉय चौधरी परिवार का इतिहास या शोभाबाजार राजबाड़ी की पूजा—इन सभी पड़ावों ने मिलकर उस दुर्गोत्सव को आकार दिया, जिसे आज बंगाल की पहचान माना जाता है। यही वजह है कि आधुनिक पंडालों और थीम की चमक के पीछे भी महिषासुरमर्दिनी की वही सदियों पुरानी आराधना आज तक कायम है।