न्यूज़ डेस्क : चीन के अपने पहले आधिकारिक दौरे से वापस लौटने के बाद बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान एक बड़ी कूटनीतिक दुविधा (उभयसंकट) में फंस गए हैं। बीजिंग में चिनफिंग सरकार ने ढाका के सामने म्यांमार के रास्ते चटगांव और कॉक्स बाजार तक एक नया 'आर्थिक गलियारा' बनाने का प्रस्ताव रखा है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह प्रस्ताव बांग्लादेश के लिए 'सांप के मुंह में छछूंदर' जैसा बन गया है। इस परियोजना के अमल में आने से बंगाल की खाड़ी में चीन का दखल सीधे तौर पर बढ़ जाएगा, जिससे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए 'सोलह आना' खतरा पैदा होना तय है। यही वजह है कि नई दिल्ली भी इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद पैनी नजर रखे हुए है।
इसी साल फरवरी (2026) में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले तारिक रहमान ने महज चार महीने के भीतर बीजिंग का दौरा किया। वहां उनकी चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ द्विपक्षीय बैठक हुई। तारिक के स्वदेश लौटने पर इस गुप्त प्रस्ताव का खुलासा हुआ, जिसे चीन-म्यांमार-बांग्लादेश आर्थिक गलियारा या 'CMBC' (China-Myanmar-Bangladesh Economic Corridor) नाम दिया गया है।
क्या है चीन का 'CMBC' प्लान और मलाक्का का डर?
प्रस्तावित CMBC परियोजना चीन के युन्नान प्रांत की राजधानी कुनमिंग से शुरू होकर म्यांमार के मांडले तक जाएगी। वहां से इसकी दो शाखाएं होंगी—एक यंगून जाएगी और दूसरी रखाइन प्रांत के क्याउकफ्यू गहरे समुद्री बंदरगाह (Kyaukphyu Deep Sea Port) की तरफ बढ़ेगी। चीन इसी हिस्से को म्यांमार के रखाइन राज्य से जोड़ते हुए बांग्लादेश के चटगांव, कॉक्स बाजार और मोंगला बंदरगाह तक फैलाना चाहता है।
सैन्य विश्लेषकों के मुताबिक, चीन यह सब अपने 'मलाक्का डिलेमा' (Malacca Dilemma) यानी मलाक्का जलडमरूमध्य पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए कर रहा है। चीन का 80 फीसदी खनिज तेल, गैस और व्यापारिक माल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है, जो भारतीय नौसेना के अंडमान-निकोबार बेस से महज 600 किमी दूर है। युद्ध की स्थिति में अगर भारत या अमेरिका ने इस रास्ते को ब्लॉक कर दिया, तो चीन की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी। इसी डर से चीन अब बंगाल की खाड़ी के जरिए सीधे हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहता है। चीन चटगांव के अनवारा में 800 एकड़ और मोंगला बंदरगाह के पास 110 एकड़ में दो विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) भी बना रहा है।

रोहिंग्या संकट का लालच और जमीनी हकीकत का रोड़ा
चीन ने बांग्लादेश को लालच दिया है कि इस कॉरिडोर के जरिए म्यांमार के साथ उसका रोहिंग्या शरणार्थी संकट हमेशा के लिए सुलझ सकता है। तारिक रहमान भी इसी शर्त पर हां कह सकते हैं। लेकिन म्यांमार की जमीनी हकीकत इस प्रोजेक्ट की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, म्यांमार की सैन्य सरकार का अब देश के केवल 20% हिस्से पर ही नियंत्रण रह गया है, जबकि 42% हिस्से पर सशस्त्र विद्रोही गुटों का कब्जा है। यह कॉरिडोर म्यांमार के जिस रखाइन राज्य से गुजरेगा, उस पर इस वक्त विद्रोही 'आराकान आर्मी' (Arakan Army) का नियंत्रण है। हालांकि, भारत इसी इलाके में अपनी 'कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट' के तहत सितवे (Sittwe) बंदरगाह से मिजोरम तक सड़क बना रहा है, जिसे आराकान आर्मी का समर्थन हासिल है। लेकिन चीन के दखल को विद्रोही गुट आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे।

अमेरिका और IMF का दबाव: दूसरी बड़ी रुकावट
बांग्लादेश के लिए दूसरा बड़ा डर अमेरिका है। वाशिंगटन बंगाल की खाड़ी में चीनी प्रभाव को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दावा किया था कि सेंट मार्टिन द्वीप पर अमेरिकी सैन्य बेस बनाने की अनुमति न देने के कारण ही उन्हें 2024 में सत्ता गंवानी पड़ी थी। वर्तमान में बांग्लादेश भीषण आर्थिक संकट से जूझ रहा है और उसने आईएमएफ (IMF) से 400-450 करोड़ डॉलर का कर्ज मांगा है। चूंकि आईएमएफ पर अमेरिका का पूरा नियंत्रण है, इसलिए अगर बांग्लादेश चीन के पाले में जाता है, तो उसे यह कर्ज मिलना मुश्किल हो जाएगा।
भारत की जासूसी का खतरा और श्रीलंका जैसा हश्र होने का डर
भारतीय रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस कॉरिडोर के बहाने चीन अंडमान-निकोबार और विशाखापत्तनम जैसे भारत के बेहद संवेदनशील नौसैनिक ठिकानों की लाइव जासूसी करना चाहता है। दिल्ली ने ढाका को आगाह किया है कि चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जाल में फंसकर श्रीलंका और नेपाल जैसे देश पहले ही दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुके हैं।
इस पूरे विवाद पर रक्षात्मक रुख अपनाते हुए बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने कहा, "CMBC के प्रस्ताव की फिलहाल समीक्षा की जा रही है। सरकार ने अभी इस मुद्दे पर कोई अंतिम स्टैंड नहीं लिया है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि इसके क्रियान्वयन के लिए म्यांमार के रखाइन राज्य में शांति बहाल होना पहली शर्त है।