ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दावे और संभावित कब्जे की बात ने यूरोप के देशों को असहज कर दिया है। यह इलाका न केवल रणनीतिक रूप से अहम है, बल्कि आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा का केंद्र भी बन चुका है। ऐसे में अमेरिका की आक्रामक नीति यूरोपीय सुरक्षा संतुलन को सीधे प्रभावित करती है।
मेलोनी का संतुलन साधने वाला बयान
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने ग्रीनलैंड में यूरोपीय नाटो सैनिकों की मौजूदगी को अमेरिका विरोधी मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि यह तैनाती रूस और चीन से संभावित खतरों को ध्यान में रखते हुए की गई है। मेलोनी के अनुसार, नाटो समन्वय में कमी के कारण अमेरिका को इस मुद्दे पर गलतफहमी हुई है।
कंवल सिब्बल का तीखा विश्लेषण
भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने मेलोनी के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि आंखें मूंद लेने से समस्या हल नहीं होगी। उनके अनुसार, मेलोनी का बयान यूरोप की वास्तविक चिंताओं को कम नहीं करता, बल्कि उन्हें और उलझा देता है। सिब्बल ने इसे मुद्दे को टालने की कोशिश बताया, जो दीर्घकाल में यूरोप के लिए नुकसानदेह हो सकती है।
रूस और चीन के नाम पर तैनाती पर सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस और चीन से ग्रीनलैंड को कितना वास्तविक खतरा है, इस पर अब तक स्पष्टता नहीं है। ऐसे में केवल सुरक्षा का तर्क देकर सीमित सैन्य तैनाती को जायज ठहराना यूरोपीय एकजुटता को कमजोर कर सकता है। इससे यह संदेश भी जाता है कि यूरोप अमेरिका के दबाव में स्पष्ट रुख अपनाने से हिचक रहा है।
टैरिफ धमकी से और गहराया विवाद
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड मुद्दे पर समर्थन न मिलने के बाद यूरोपीय देशों पर लगाए गए टैरिफ ने विवाद को और भड़का दिया है। यूरोप ने इसे आर्थिक दबाव और ब्लैकमेल की नीति करार दिया है। इस कदम से यूरोप-अमेरिका संबंधों में तनाव खुलकर सामने आ गया है और ग्रीनलैंड केवल एक भू-राजनीतिक प्रतीक बनकर रह गया है।
यूरोप के लिए चेतावनी का संकेत
ग्रीनलैंड पर आंख बंद करने की नीति यूरोप को अल्पकालिक राहत तो दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह रणनीतिक कमजोरी बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्पष्ट और सामूहिक रुख अपनाए बिना यूरोप इस संकट से सुरक्षित नहीं रह पाएगा।
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