नई दिल्ली: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को मॉस्को में आयोजित 'वल्दाई फोरम' के मंच से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक रुख की खुलकर सराहना की। पुतिन ने स्पष्ट किया कि भारत और रूस के बीच बेहद करीबी और दोस्ताना संबंध होने के बावजूद, पीएम मोदी यूक्रेन युद्ध को लेकर पूरी तरह निष्पक्ष रहे हैं और दोनों देशों के बीच जारी संघर्ष को जल्द समाप्त कराने के लगातार पक्षधर हैं।
'दोस्ती अपनी जगह, लेकिन पीएम मोदी हमेशा युद्ध रोकने की बात करते हैं'
वल्दाई फोरम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति पुतिन ने कहा, "नरेंद्र मोदी उन चुनिंदा वैश्विक नेताओं में से हैं, जिनके साथ रूस के रिश्ते बहुत मजबूत हैं और मेरे साथ भी उनकी गहरी व्यक्तिगत निकटता है। इसके बावजूद, उन्होंने हर मंच पर यूक्रेन के साथ जारी संघर्ष को रोकने की वकालत की है।" पुतिन ने आगे कहा कि युद्ध खत्म करने और एक ऐसा समाधान निकालने में पीएम मोदी की गहरी रुचि है, जो दोनों पक्षों को स्वीकार्य हो। उन्होंने कहा कि शांति को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के कुछ अपने विचार हैं, जो बेहद सकारात्मक हैं और इस निष्पक्ष दृष्टिकोण के लिए रूस उनका आभारी है।
बातचीत और कूटनीति पर भारत का अडिग रुख
यूक्रेन संकट की शुरुआत से ही नई दिल्ली ने किसी का पक्ष न लेते हुए शांतिपूर्ण समाधान पर बल दिया है। पिछले महीने भारत में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के दौरान 11 सितंबर को दोनों नेताओं की द्विपक्षीय बैठक हुई थी, जिसमें पीएम मोदी ने स्पष्ट कहा था कि "किसी भी विवाद का समाधान केवल संवाद और कूटनीति से ही संभव है।" इससे पहले किर्गिस्तान में हुए एससीओ (SCO) सम्मेलन के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी ने रेखांकित किया था कि दुनिया को 'अंतहीन युद्ध' की जगह 'युद्ध की समाप्ति' की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
पश्चिमी दबाव के बीच राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों ने मॉस्को पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद भारत ने रियायती दरों पर रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। इस कदम पर नाराजगी जताते हुए अमेरिका ने दावा किया था कि भारत से मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल युद्ध में हो रहा है, यहां तक कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में भारतीय उत्पादों पर ऊंचे टैरिफ का दबाव भी बनाया गया। हालांकि, नई दिल्ली ने कड़ा संदेश देते हुए स्पष्ट किया कि भारत की विदेश नीति पूरी तरह से अपने राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार की जरूरतों के आधार पर संचालित होती है।