भोपाल | राजधानी भोपाल में मोबाइल टावर लगाने की व्यवस्था को लेकर अब स्थानीय स्तर पर नए नियम तय किए जाएंगे। सिर्फ जमीन उपलब्ध होने के आधार पर किसी स्थान पर मोबाइल टावर लगाने की अनुमति नहीं होगी। स्कूल, अस्पताल, छात्रावास, खेल मैदान, जेल और घनी आबादी वाले इलाकों में टावर स्थापना को लेकर स्थानीय भूमि उपयोग और भवन निर्माण नियमों के आधार पर प्रक्रिया तय की जाएगी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने नगरीय विकास विभाग और नगर निगम को इस संबंध में स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इसमें टावर लगाने से पहले भूमि उपयोग, भवन नियम, पर्यावरण मानक और रेडिएशन जांच जैसे पहलुओं को शामिल किया जाएगा।
बागमुगालिया के टावर से जुड़ा था मामला
यह मामला भोपाल के बागमुगालिया स्थित अरविंद विहार में लगाए गए मोबाइल टावर से जुड़ा है। मध्य क्षेत्रीय सामाजिक एवं कानूनी कल्याण सोसायटी ने टावर की स्थापना को लेकर NGT में याचिका दायर की थी। याचिका में दावा किया गया था कि टावर के आसपास घनी आबादी के अलावा स्कूल, हॉस्टल और अस्पताल भी संचालित हो रहे हैं। इसी मामले की सुनवाई के दौरान NGT ने मोबाइल टावरों की स्थापना और संचालन से जुड़े स्थानीय नियमों को स्पष्ट करने की जरूरत बताई।
रेडिएशन से नुकसान की स्पष्ट पुष्टि नहीं
NGT ने विशेषज्ञ रिपोर्ट और उपलब्ध वैज्ञानिक सामग्री का हवाला देते हुए कहा कि फिलहाल दूरसंचार नेटवर्क से निकलने वाले गैर-आयनकारी रेडिएशन से किसी स्पष्ट या पहचाने जा सकने वाले नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने टावरों की स्थापना और संचालन के लिए स्थानीय स्तर पर स्पष्ट व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसके तहत नगरीय विकास विभाग और नगर निगम को वैज्ञानिक अध्ययनों, उपलब्ध आंकड़ों, स्थानीय भूमि उपयोग और भवन निर्माण नियमों को ध्यान में रखते हुए SOP तैयार करनी होगी। इस SOP में यह स्पष्ट किया जाएगा कि संवेदनशील और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में मोबाइल टावर लगाने के लिए किन शर्तों और नियमों का पालन करना होगा।
टावर चालू करने से पहले देना होगा रेडिएशन प्रमाण
मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन की जांच दूरसंचार विभाग की टेलीकॉम एनफोर्समेंट रिसोर्स एंड मॉनिटरिंग (TERM) सेल करेगी। NGT ने नियमित जांच के निर्देश दिए हैं। यदि जांच में निर्धारित सीमा से अधिक रेडिएशन पाया जाता है तो नियमों के अनुसार तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई करनी होगी। इसके अलावा, टेलीकॉम सेवा प्रदाता को रेडिएशन जांच शुरू होने के 15 दिन के भीतर यह प्रमाणित करना होगा कि टावर से निकलने वाला रेडिएशन निर्धारित मानकों के भीतर है। यह सेल्फ-सर्टिफिकेट देने के बाद ही टावर का संचालन शुरू किया जा सकेगा।
DG सेट के लिए भी लेना होगा प्रदूषण बोर्ड से अनुमति
मोबाइल टावर को बिजली उपलब्ध कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले डीजी सेट को भी नए नियमों के दायरे में रखा गया है। इसके लिए संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या प्रदूषण नियंत्रण समिति से अनुमति लेना जरूरी होगा। डीजी सेट से निकलने वाले धुएं और उससे होने वाले शोर के लिए निर्धारित पर्यावरणीय मानकों का पालन करना होगा। यानी टावर की स्थापना के साथ उसके संचालन के दौरान होने वाले संभावित प्रदूषण को भी ध्यान में रखा जाएगा।
स्कूल और अस्पताल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष ध्यान
NGT के निर्देशों के बाद अब स्थानीय स्तर पर मोबाइल टावर स्थापना की प्रक्रिया ज्यादा स्पष्ट किए जाने की तैयारी है। खास तौर पर स्कूल, अस्पताल, छात्रावास, खेल मैदान, जेल और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में टावर लगाने के मामलों में भूमि उपयोग और भवन निर्माण नियमों को ध्यान में रखा जाएगा। नई SOP के जरिए टावर स्थापना से जुड़े मामलों में अलग-अलग मानकों को एक प्रक्रिया के तहत लाने की कोशिश की जाएगी। इसमें स्थानीय नियमों के साथ रेडिएशन जांच और पर्यावरणीय मानकों का भी ध्यान रखा जाएगा।
नगर निगम और नगरीय विकास विभाग को बनानी होगी SOP
NGT के निर्देश के बाद अब नगरीय विकास विभाग और नगर निगम की जिम्मेदारी होगी कि वे मोबाइल टावर लगाने के लिए स्थानीय स्तर पर स्पष्ट SOP तैयार करें। इस व्यवस्था में टावर लगाने से पहले स्थान की स्थिति, भूमि उपयोग, भवन नियम, पर्यावरणीय मानक और रेडिएशन से जुड़े प्रमाण की जांच को शामिल किया जाएगा। इससे राजधानी में मोबाइल टावरों की स्थापना और संचालन के लिए एक स्पष्ट स्थानीय प्रक्रिया तैयार हो सकेगी।