ग्वालियर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने दतिया से कांग्रेस विधायक घनश्याम सिंह की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अदालत ने उनके निर्वाचन को चुनौती देने वाली एक याचिका पर कड़ा रुख अपनाते हुए विधायक को नोटिस जारी किया है। याचिका में यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि विधायक ने अपने चुनावी हलफनामे में आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई है। जस्टिस अमित सेठ ने कांग्रेस विधायक घनश्याम सिंह को नोटिस जारी कर इस मामले में उनका जवाब तलब किया है। यह पूरा विवाद उनके चुनाव हलफनामे में पुराने आपराधिक मामलों को कथित तौर पर छुपाए जाने को लेकर खड़ा हुआ है। अदालत के इस कदम से सियासी हलचल तेज हो गई है।
याचिका में लगाए गए आरोप
यह चुनाव याचिका बीजेपी नेता और एडवोकेट दीपक बेलपात्री की तरफ से दायर की गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि विधायक घनश्याम सिंह ने जुलाई में हुए उप-चुनाव और साल 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान दिए गए शपथ पत्र में कुछ आपराधिक मामलों का जिक्र नहीं किया। हलफनामे में सही जानकारी न देने को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में दावा किया गया है कि पुराने मामलों को जानबूझकर ओमिट किया गया। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार हलफनामे में आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी देना अनिवार्य होता है। इस आधार पर निर्वाचन को चुनौती दी गई है। अदालत ने इन आरोपों पर संज्ञान लेते हुए नोटिस जारी किया।
1991 का पुराना मामला
याचिका के मुताबिक साल 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद दतिया में हुए प्रदर्शनों और सड़क जाम से जुड़ा एक एफआईआर दर्ज किया गया था। इस मामले में घनश्याम सिंह समेत करीब 22 लोगों के नाम शामिल होने और चार्जशीट दाखिल किए जाने का दावा किया गया है। याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि हालिया उप-चुनाव के हलफनामे में जहां दो अन्य पेंडिंग मामलों की जानकारी दी गई थी वहीं 1991 के इन मामलों को क्यों छुपाया गया। इसके अलावा 2020 के एक अन्य मामले को भी 2023 के विधानसभा चुनाव हलफनामे में कथित तौर पर ओमिट करने का आरोप है। पुराने मामलों की जानकारी छुपाने को लेकर याचिकाकर्ता ने अदालत का रुख किया।
उपचुनाव और जीत का विवरण
दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने बीजेपी उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को 6016 वोटों के अंतर से हराया था। इस उपचुनाव के लिए 30 जुलाई को मतदान हुआ था और 3 अगस्त को नतीजे घोषित किए गए थे। जीत के बाद अब यह कानूनी चुनौती उनके सामने आई है। उपचुनाव के दौरान दिए गए हलफनामे को लेकर ही मुख्य आपत्तियां उठाई गई हैं। सियासी गलियारों में इस नोटिस को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विधायक के जवाब का इंतजार सभी को है। अदालती प्रक्रिया के आगे बढ़ने से राजनीतिक प्रभाव भी पड़ सकता है।
मामला ग्वालियर बेंच पहुंचा
शुरुआत में यह चुनाव याचिका हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच के समक्ष दायर की गई थी जिसे बाद में सुनवाई के लिए ग्वालियर बेंच ट्रांसफर कर दिया गया था। ग्वालियर बेंच में जस्टिस अमित सेठ की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया। ट्रांसफर के बाद अब ग्वालियर में कार्यवाही आगे बढ़ेगी। याचिकाकर्ता ने विस्तृत दस्तावेज और सबूतों के साथ अदालत का रुख किया है। विधायक को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है। अदालत ने समयबद्ध जवाब तलब किया है।
सियासी गलियारों में हलचल
हाईकोर्ट के इस नोटिस के बाद दतिया के सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सभी की नजरें विधायक के जवाब पर टिकी हुई हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों पक्ष इस मामले पर नजर रखे हुए हैं। कानूनी प्रक्रिया के दौरान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी शुरू हो सकते हैं। विधायक पर दबाव बढ़ने की चर्चा है। स्थानीय स्तर पर इस मुद्दे ने चुनावी हलफनामों की पारदर्शिता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। आगे की सुनवाई पर सभी की निगाहें रहेंगी।
हलफनामे की पारदर्शिता का सवाल
चुनावी हलफनामों में आपराधिक मामलों की सही जानकारी देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियादी जरूरत है। इस मामले में लगाए गए आरोपों ने फिर से इस नियम के पालन पर ध्यान केंद्रित किया है। अदालत के नोटिस से विधायक को अपना पक्ष स्पष्ट करने का मौका मिला है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो कानूनी परिणाम हो सकते हैं। चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता बनाए रखने के लिए ऐसे मामले महत्त्वपूर्ण होते हैं। मध्य प्रदेश की राजनीति में इस नोटिस ने नई चर्चा को जन्म दे दिया है। आगे की कार्यवाही सभी के लिए रुचिकर बनी हुई है।