श्योपुर. भारत में दशकों बाद चीतों की वापसी के लिए शुरू किए गए प्रोजेक्ट चीता ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में नई उम्मीद जगाई है। मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में अफ्रीकी चीतों के सफल पुनर्वास के बाद अब इस महत्वाकांक्षी परियोजना को दूसरे राज्यों तक विस्तार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। गुजरात के कच्छ क्षेत्र स्थित विशाल बन्नी घासभूमि को चीतों के नए आवास के रूप में विकसित करने की तैयारी लगभग अंतिम चरण में पहुंच गई है। विशेषज्ञों की विस्तृत समीक्षा के बाद इस संबंध में महत्वपूर्ण रिपोर्ट उच्च स्तरीय संचालन समिति को सौंप दी गई है।
विशेषज्ञ दल ने किया व्यापक स्थलीय मूल्यांकन
प्रोजेक्ट चीता से जुड़े वरिष्ठ विशेषज्ञों, वन्यजीव चिकित्सकों तथा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के अधिकारियों ने हाल ही में बन्नी क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण किया। इस दौरान चीतों के दीर्घकालिक संरक्षण और सुरक्षित पुनर्वास के लिए आवश्यक विभिन्न मानकों का परीक्षण किया गया। विशेषज्ञ दल ने क्षेत्र की पारिस्थितिकी, उपलब्ध संसाधनों और वन्यजीव प्रबंधन की व्यवस्थाओं का गहन अध्ययन कर यह आकलन किया कि क्या यह क्षेत्र चीतों के लिए उपयुक्त प्राकृतिक आवास साबित हो सकता है।
सात महत्वपूर्ण मानकों पर हुई गहन जांच
मूल्यांकन के दौरान विशेषज्ञों ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया। इनमें शिकार प्रजातियों की उपलब्धता, चीतों के विचरण के लिए पर्याप्त खुला क्षेत्र, चिकित्सा सुविधाओं की तैयारी, सुरक्षा बाड़ों की गुणवत्ता, मानव गतिविधियों का प्रभाव, आसपास के वन क्षेत्रों से संपर्क तथा दीर्घकालिक संरक्षण प्रबंधन की संभावनाएं शामिल थीं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े शिकारी प्राणी के सफल पुनर्वास के लिए इन सभी कारकों का संतुलित होना आवश्यक है।
गुजरात के पक्ष में मानी जा रही हैं सिफारिशें
हालांकि आधिकारिक रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन परियोजना से जुड़े सूत्रों के अनुसार विशेषज्ञ दल की सिफारिशें काफी हद तक सकारात्मक बताई जा रही हैं। माना जा रहा है कि बन्नी घासभूमि की विशाल खुली भूमि, प्राकृतिक परिस्थितियां और वन्यजीव संसाधन चीतों के लिए उपयुक्त पाए गए हैं। यदि उच्च स्तरीय समिति अंतिम मंजूरी दे देती है, तो यह कूनो के बाहर चीतों के पुनर्वास का पहला बड़ा उदाहरण होगा और परियोजना के विस्तार में ऐतिहासिक कदम माना जाएगा।
कूनो से भेजे जा सकते हैं तीन चीते
सूत्रों के अनुसार प्रारंभिक चरण में कूनो राष्ट्रीय उद्यान में रह रहे बोत्सवाना मूल के तीन चीतों को गुजरात भेजे जाने की संभावना है। इनमें दो मादा और एक नर चीता शामिल बताए जा रहे हैं। इन चीतों का चयन उनकी स्वास्थ्य स्थिति, व्यवहार और नए आवास में अनुकूलन क्षमता को ध्यान में रखकर किया जाएगा। वन विभाग और विशेषज्ञों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्थानांतरण प्रक्रिया पूरी तरह वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से संपन्न हो।
बन्नी घासभूमि क्यों है खास?
कच्छ की बन्नी घासभूमि एशिया के सबसे बड़े प्राकृतिक घासभूमि क्षेत्रों में गिनी जाती है। यह क्षेत्र अपनी विशिष्ट जैव विविधता, विस्तृत खुले भूभाग और विभिन्न वन्यजीव प्रजातियों के लिए जाना जाता है। विशाल घासभूमि होने के कारण यहां चीतों को पर्याप्त दौड़ने और शिकार करने का अवसर मिल सकता है। वन्यजीव विशेषज्ञ लंबे समय से मानते रहे हैं कि भारत में चीतों के संरक्षण के लिए ऐसे खुले और विस्तृत क्षेत्रों की आवश्यकता है, जहां उनका प्राकृतिक व्यवहार विकसित हो सके।
वन्यजीव संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुजरात में चीतों का पुनर्वास सफल रहता है, तो भारत में चीता संरक्षण कार्यक्रम को नई गति मिलेगी। इससे एक ही क्षेत्र पर निर्भरता कम होगी और विभिन्न आवासों में चीतों की स्थायी आबादी विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होगा। साथ ही यह परियोजना घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण, स्थानीय जैव विविधता के संवर्धन और वन्यजीव पर्यटन को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
भारत में चीता संरक्षण का नया अध्याय
कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों की वापसी ने भारतीय वन्यजीव इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा था। अब यदि बन्नी घासभूमि में भी चीतों का सफल पुनर्वास होता है, तो यह परियोजना केवल एक संरक्षण कार्यक्रम नहीं बल्कि देश में विलुप्त प्रजातियों के पुनर्स्थापन का वैश्विक उदाहरण बन सकती है। आने वाले समय में विशेषज्ञों और वन विभाग की निगाहें इस महत्वाकांक्षी योजना के अगले चरण पर टिकी रहेंगी।