नई दिल्ली - दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि, पति या ससुराल पक्ष द्वारा पत्नी से परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल में सहयोग करने को कहना अपने आप में क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी सामान्य पारिवारिक अपेक्षाओं को आपराधिक कृत्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह टिप्पणी जस्टिस नीना बंसल की सिंगल बेंच ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की।
अदालत ने FIR रद्द की
अदालत ने महिला द्वारा दर्ज कराई गई FIR और उससे जुड़ी सभी कानूनी कार्यवाही को रद्द कर दिया। दरअसल, यह मामला एक महिला की शिकायत से जुड़ा था, जिसमें उसने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ धारा 498A IPC, और धारा 406 IPC और घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत मामला दर्ज कराया था। महिला का आरोप था कि उसे परिवार के सदस्यों की देखभाल करने के लिए मजबूर किया गया, जिसे उसने मानसिक उत्पीड़न बताया।
दिल्ली हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
हालांकि, कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी महिला से परिवार के बुजुर्गों या अन्य सदस्यों की देखभाल में सहयोग करने की अपेक्षा की जाती है, तो इसे स्वतः क्रूरता या उत्पीड़न नहीं माना जा सकता, जब तक कि इसके साथ कोई गंभीर दुर्व्यवहार या दबाव के ठोस प्रमाण न हों। अदालत ने यह भी कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाना चाहिए और हर पारिवारिक विवाद को आपराधिक मामला बनाना उचित नहीं है। इस आधार पर कोर्ट ने मामले में दर्ज FIR और संबंधित कार्यवाही को खारिज कर दिया।
इस फैसले को पारिवारिक विवादों और 498A जैसे मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है, जो भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई पर असर डाल सकता है।
Comments (0)