यह कार्रवाई संसद की एथिक्स कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर की गई, जिसमें महुआ पर 'अनैतिक आचरण' और 'गंभीर रूप से ख़राब आचरण' का दोषी पाते हुए उनके निष्कासन की सिफ़ारिश की गई थी.
अब महुआ मोइत्रा के सामने क्या क़ानूनी विकल्प हैं
टीएमसी सांसद के पास अपने निष्कासन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प खुला है. रिपोर्ट में लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य के हवाले से यह बात कही गई है.
आचार्य बताते हैं कि संविधान का अनुच्छेद 122 स्पष्ट तौर पर कहता है कि संसदीय कार्यवाही को प्रक्रियाओं में अनियमितता के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती.
लेकिन साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने राजा राम पाल केस में कहा था कि 'इस तरह की पाबंदी सिर्फ़ प्रक्रिया में अनियमितताओं के संबंध हैं, लेकिन कुछ मामले ऐसे हो सकते हैं जहां पर न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है बीएसपी के सांसद रहे राजा राम पाल उन 12 सांसदों में से थे, जिन्हें साल 2005 के 'कैश फ़ॉर वोट' मामले में शामिल होने के आरोप में निलंबित कर दिया गया था.
निष्कासित सांसदों की याचिका को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक खंडपीठ ने 4-1 के बहुमत से ख़ारिज कर दिया था और उनके निष्कासन को बरक़रार रखा था.
जनवरी 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन सांसदों का निष्कासन संसद ने ‘अपनी सुरक्षा’ के लिए किया है.
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इसी मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 'विधायिका की जिन कार्यवाहियों में वैधानिकता और संवैधानिकता के मामले में पर्याप्त गड़बड़ हो, उन्हें न्यायिक जांच से छूट नहीं मिल सकती.'
चीफ़ जस्टिस के नेतृत्व वाली बेंच ने कहा था कि 'विधायिका द्वारा किए जाने वाले कामों में अगर नागरिक को मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो तो उन्हें जांच से छूट नहीं मिलती
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 105(3) की भी बात की थी, जिसके तहत संसद, इसके सदस्यों और कमेटियों की शक्तियों और विशेषाधिकारों की बात की गई है.कोर्ट ने कहा था कि 'इस दावे का कोई आधार नहीं है कि संसदीय कार्यवाहियों को अनुच्छेद 105 (3) के तहत पूरी तरह से प्रतिरक्षा मिली हुई है. जिस तरीक़े से विधायिका अपने विशेषाधिकारों को लागू करती है, उसे लेकर न्यायिक जांच की जा सकती है.'
कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि 'जिस सामग्री के आधार पर विधायिका ने कार्यवाही की होगी, अदालत उसे लेकर सवाल नहीं पूछ सकती और न ही उसकी पर्याप्तता पर जाएगी |
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