नई दिल्ली. Centre for Research on Energy and Clean Air की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के बाद मार्च महीने में वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई। यह स्थिति उस समय उत्पन्न हुई जब पश्चिम एशिया में संघर्ष के चलते आपूर्ति श्रृंखलाएं प्रभावित हुईं और ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई।
गैस आधारित उत्पादन में आई गिरावट
रिपोर्ट के अनुसार कुल जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन में लगभग 1 प्रतिशत की कमी देखी गई, जिसमें कोयला आधारित उत्पादन लगभग स्थिर रहा, जबकि गैस आधारित उत्पादन में 4 प्रतिशत की गिरावट आई। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि वैश्विक ऊर्जा प्रणाली अब धीरे-धीरे वैकल्पिक स्रोतों की ओर बढ़ रही है।
सौर और पवन ऊर्जा का बढ़ता प्रभाव
इस गिरावट की भरपाई मुख्य रूप से सौर और पवन ऊर्जा ने की। भारत और अमेरिका जैसे देशों में सौर ऊर्जा के विस्तार ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई, जबकि नीदरलैंड और जर्मनी में पवन ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि ने ऊर्जा संतुलन बनाए रखने में मदद की। यह दर्शाता है कि स्वच्छ ऊर्जा स्रोत अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि मुख्यधारा बनते जा रहे हैं।
अन्य देशों में वैकल्पिक स्रोतों का योगदान
दक्षिण अफ्रीका और तुर्किये जैसे देशों में परमाणु और जलविद्युत संयंत्रों के बेहतर संचालन ने भी ऊर्जा उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विविध स्रोतों का उपयोग कर रहे हैं, जिससे निर्भरता का संतुलन बना रहता है।
कोयला परिवहन में भी आई कमी
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि समुद्री मार्ग से कोयले के परिवहन में 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो वर्ष 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है। यह आंकड़ा इस बात की पुष्टि करता है कि वैश्विक स्तर पर कोयले की मांग में भी धीरे-धीरे कमी आ रही है।
स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ता वैश्विक रुझान
इस विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि हालिया संकट के बावजूद वैश्विक ऊर्जा प्रणाली ने लचीलापन दिखाया है और स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार ने बड़े झटकों को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह प्रवृत्ति भविष्य में जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।