नई दिल्ली. 25 अगस्त को सीमा को लेकर जारी 8 सूत्रीय परिणाम और सहमति संबंधी बयान तथा ब्रिक्स सम्मेलन के बाद भारत और चीन की ओर से जारी अलग-अलग बयानों से संकेत मिलता है कि दोनों देश फिलहाल सीमा विवाद को एक नियंत्रित स्थिति में रखने की कोशिश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने भी इस प्रक्रिया को राजनीतिक स्तर पर आगे बढ़ाने का संकेत दिया है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सीमा विवाद समाप्त हो गया है।
क्या भारत-चीन के बीच बना है ‘नैश संतुलन’?
इस स्थिति को समझने के लिए अर्थशास्त्र और खेल सिद्धांत में इस्तेमाल होने वाले ‘नैश संतुलन’ की अवधारणा उपयोगी हो सकती है। इसका सामान्य अर्थ ऐसी स्थिति से है, जिसमें किसी पक्ष को केवल अपनी रणनीति बदलकर पहले से बेहतर परिणाम हासिल होने की उम्मीद नहीं होती। भारत और चीन के संदर्भ में देखें तो दोनों देश शायद यह समझ रहे हैं कि निकट भविष्य में सीमा विवाद में अपनी स्थिति को निर्णायक रूप से बेहतर बनाना आसान नहीं है।
टकराव खत्म नहीं, लेकिन सीमित हो सकता है
नैश संतुलन का अर्थ स्थायी शांति या सीमा विवाद का समाधान नहीं होता। भारत और चीन के बीच राजनयिक बयानबाजी और सैन्य गतिविधियों को लेकर तनाव आगे भी देखने को मिल सकता है। दोनों देशों के बीच 2013 के बाद कई मौकों पर ऐसा हुआ है। लेकिन यदि मौजूदा संतुलन कायम रहता है तो हिमालयी क्षेत्र में नियंत्रण रेखा को लेकर होने वाला टकराव सीमित दायरे में रह सकता है और दोनों पक्ष बड़े सैन्य टकराव से बचने की कोशिश कर सकते हैं।
दोनों देशों के लिए मौजूदा स्थिति क्यों अहम है?
भारत और चीन दोनों के सामने सीमा पर अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने के साथ-साथ व्यापक राष्ट्रीय हितों को भी साधने की चुनौती है। किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष की कीमत दोनों देशों को आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक स्तर पर चुकानी पड़ सकती है। ऐसे में यदि मौजूदा स्थिति में कोई पक्ष केवल अपनी रणनीति बदलकर निर्णायक लाभ हासिल नहीं कर सकता, तो नियंत्रित प्रतिस्पर्धा और संवाद का रास्ता दोनों के लिए अपेक्षाकृत व्यावहारिक विकल्प बन सकता है।
पहला बड़ा जोखिम: दलाई लामा के उत्तराधिकारी का सवाल
इस संतुलन के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक दलाई लामा के उत्तराधिकारी का प्रश्न हो सकता है। उत्तराधिकार का मुद्दा भारत और चीन के बीच पहले से संवेदनशील तिब्बत संबंधी विषयों को फिर से राजनीतिक और कूटनीतिक बहस के केंद्र में ला सकता है। यदि इस मुद्दे पर दोनों देशों के रुख में तीखा अंतर उभरता है, तो सीमा पर बना मौजूदा संतुलन भी प्रभावित होने की आशंका रहेगी।
दूसरा जोखिम: भारत-पाकिस्तान संघर्ष और चीन की भूमिका
दूसरी बड़ी चुनौती भारत और पाकिस्तान के बीच किसी संभावित सैन्य संघर्ष से जुड़ी है। यदि ऐसा संघर्ष व्यापक रूप लेता है और चीन उसमें सीधे तौर पर शामिल होता है, तो भारत के सामने एक साथ 2 मोर्चों पर सुरक्षा चुनौती खड़ी हो सकती है। ऐसी स्थिति मौजूदा भारत-चीन संतुलन को तेजी से बदल सकती है और दोनों देशों के बीच सीमा पर प्रतिस्पर्धा को कहीं अधिक गंभीर सैन्य समीकरण में बदलने का खतरा पैदा कर सकती है।
क्या यह संतुलन लंबे समय तक कायम रहेगा?
फिलहाल भारत-चीन संबंधों में ऐसा संतुलन दिखाई देता है, जिसमें दोनों पक्ष सीमा विवाद को पूरी तरह हल किए बिना भी टकराव को नियंत्रित रखने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन यह व्यवस्था स्थायी नहीं मानी जा सकती। दलाई लामा के उत्तराधिकार से जुड़ा घटनाक्रम या भारत-पाकिस्तान तनाव में चीन की सीधी भागीदारी जैसे मुद्दे पूरे समीकरण को बदल सकते हैं। इसलिए आने वाले समय में भारत-चीन संबंधों की दिशा केवल सीमा पर सैन्य गतिविधियों से नहीं, बल्कि इन व्यापक रणनीतिक घटनाक्रमों से भी तय होगी।