पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने युद्ध के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया के युद्ध और दक्षिण एशिया में बढ़ते सुरक्षा तनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य के युद्ध केवल टैंकों, लड़ाकू विमानों और मिसाइलों से नहीं लड़े जाएंगे। ड्रोन अब निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और सटीक हमलों का सबसे प्रभावी माध्यम बनते जा रहे हैं। इसी बदलते परिदृश्य को देखते हुए भारत ने स्वदेशी ड्रोन विकास पर अभूतपूर्व गति से काम शुरू किया है।
आयातक से निर्यातक बनने की दिशा में भारत
लंबे समय तक भारत सैन्य ड्रोन तकनीक के लिए अमेरिका, इज़राइल और अन्य देशों पर निर्भर रहा। लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है। देश की निजी और स्वदेशी रक्षा कंपनियां ऐसे ड्रोन विकसित कर रही हैं जो न केवल भारतीय सेनाओं की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं बल्कि वैश्विक बाजार में भी प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखते हैं। पश्चिम एशिया और नाटो देशों के बाजारों में भी भारतीय ड्रोन तकनीक को लेकर बढ़ती रुचि दिखाई दे रही है।
‘शेषनाग-150’ बना भारत की नई ताकत का प्रतीक
भारतीय रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ‘शेषनाग-150’ को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। बेंगलुरु स्थित एक रक्षा स्टार्टअप द्वारा विकसित यह अत्याधुनिक लड़ाकू ड्रोन अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। इसे केवल निगरानी के लिए नहीं बल्कि लंबी दूरी तक सटीक आक्रमण करने की क्षमता के साथ विकसित किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारतीय ड्रोन उद्योग के लिए एक नई शुरुआत का संकेत है।
लंबी दूरी और सटीक हमले की क्षमता
शेषनाग-150 की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लंबी दूरी तक संचालन क्षमता मानी जा रही है। यह उच्च गति से उड़ान भरने के साथ लंबी अवधि तक आकाश में रह सकता है और दुश्मन के इलाके में गहराई तक पहुंचकर मिशन पूरा करने में सक्षम है। आधुनिक युद्धों में ऐसी क्षमताएं अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं क्योंकि वे सैनिकों के जोखिम को कम करते हुए रणनीतिक बढ़त प्रदान करती हैं।
सेना की जरूरतें भी तेजी से बदल रही हैं
भारतीय सशस्त्र बलों की प्राथमिकताओं में भी बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। पहले जहां निगरानी ड्रोन की मांग अधिक थी, वहीं अब लंबी दूरी तक मार करने वाले, अधिक समय तक उड़ान भरने वाले और विशिष्ट मिशनों के लिए तैयार किए गए ड्रोन की आवश्यकता बढ़ रही है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में बड़ी संख्या में स्वायत्त और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ड्रोन सैन्य अभियानों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।
स्वदेशी रक्षा उद्योग को मिलेगा बड़ा बढ़ावा
ड्रोन निर्माण के क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियां केवल सैन्य दृष्टि से ही नहीं बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। इससे देश में रक्षा विनिर्माण, अनुसंधान, नवाचार और रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीकों को बढ़ावा देने की नीति अब जमीन पर प्रभावी रूप से दिखाई देने लगी है।
वैश्विक रक्षा बाजार में बढ़ेगा भारत का प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इसी गति से ड्रोन तकनीक विकसित करता रहा तो आने वाले वर्षों में वह वैश्विक रक्षा निर्यात बाजार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन सकता है। भारतीय कंपनियां निगरानी, सामरिक और लड़ाकू ड्रोन के क्षेत्र में नई तकनीकों पर काम कर रही हैं। इससे न केवल देश की सुरक्षा क्षमता मजबूत होगी, बल्कि भारत की रणनीतिक और आर्थिक शक्ति में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
भविष्य की लड़ाइयों का केंद्र बनेंगे ड्रोन
आधुनिक युद्धों के अनुभव यह संकेत देते हैं कि ड्रोन आने वाले समय में सैन्य अभियानों की रीढ़ बनने वाले हैं। ऐसे में भारत का इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। स्वदेशी तकनीक, बढ़ती उत्पादन क्षमता और वैश्विक मांग के बीच भारत अब उस स्थिति की ओर बढ़ रहा है जहां उसके बनाए ड्रोन केवल भारतीय सीमाओं की रक्षा ही नहीं करेंगे, बल्कि दुनिया के कई देशों के आसमान में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे।