नई दिल्ली. केंद्रीय जल आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण तेजी से घटकर लगभग 82 अरब घन मीटर रह गया है, जो कुल क्षमता का लगभग 45 प्रतिशत ही है। फरवरी के बाद से इसमें लगातार गिरावट देखी जा रही है और महज दो महीनों में ही करीब 22 प्रतिशत पानी कम हो चुका है। यह स्थिति आने वाले गर्मी के महीनों के लिए गंभीर संकेत दे रही है।
जलाशयों की स्थिति: कई स्थानों पर संकट गहराया
देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित प्रमुख जलाशयों का जलस्तर चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में खांडोंग, दक्षिण भारत में तातिहल्ला, पेरियार, शोलायर और वैगई जैसे जलाशयों में पानी काफी कम रह गया है। कुछ स्थानों पर तो जलस्तर इतना नीचे पहुंच गया है कि जलाशय लगभग सूखने की कगार पर हैं। बिहार का चंदन जलाशय पूरी तरह सूख जाना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है।
राज्यों में गिरावट का असंतुलित प्रभाव
यदि राज्यों के स्तर पर स्थिति का विश्लेषण करें तो उत्तर-पश्चिम और पश्चिम भारत के कुछ राज्यों में जलस्तर में अत्यधिक गिरावट दर्ज की गई है। पंजाब और राजस्थान में जल भंडारण में भारी कमी देखी गई है, वहीं महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। यह असंतुलन इस बात की ओर संकेत करता है कि जल प्रबंधन की चुनौतियां क्षेत्रवार भिन्न हैं और इसके लिए स्थानीय स्तर पर विशेष रणनीति की आवश्यकता है।
क्षेत्रवार परिदृश्य: दक्षिण भारत सबसे अधिक प्रभावित
देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में जलस्तर में गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन दक्षिण भारत की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। यहां जलाशयों में पानी का स्तर अन्य क्षेत्रों की तुलना में काफी कम हो गया है। उत्तर, पूर्व, पश्चिम और मध्य क्षेत्रों में भी गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन दक्षिणी क्षेत्र में यह गिरावट सबसे अधिक रही है, जिससे वहां जल संकट की संभावना और बढ़ गई है।
नदी बेसिनों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं
देश के प्रमुख नदी बेसिनों में भी जलस्तर सामान्य से नीचे बना हुआ है। तापी, गंगा, महानदी, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी और कृष्णा जैसे प्रमुख बेसिनों में जल भंडारण आधी क्षमता के आसपास या उससे भी कम रह गया है। उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में सिंधु और पूर्वोत्तर में ब्रह्मपुत्र बेसिन की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है। यह परिदृश्य दर्शाता है कि जल संकट केवल जलाशयों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक जल संसाधनों को प्रभावित कर रहा है।
गिरावट के कारण: कम वर्षा और बढ़ती मांग
विशेषज्ञों के अनुसार इस स्थिति के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें जनवरी और फरवरी के दौरान कम वर्षा प्रमुख है। इसके अलावा सिंचाई और विद्युत उत्पादन के लिए बढ़ती जल मांग ने भी जलाशयों पर दबाव बढ़ाया है। पिछले वर्ष अच्छे मानसून के कारण जलाशय भरे हुए थे, लेकिन इस वर्ष शुरुआती महीनों में अधिक खपत के चलते जल स्तर तेजी से गिरा है।
भविष्य की चेतावनी और समाधान की आवश्यकता
वर्तमान स्थिति भले ही पिछले वर्ष और दीर्घकालिक औसत से थोड़ी बेहतर दिखाई दे, लेकिन गिरावट की गति ने चिंता को बढ़ा दिया है। यदि जल के उपयोग और प्रबंधन पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो गर्मियों में कई राज्यों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। यह समय है जब जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और संसाधनों के संतुलित उपयोग पर विशेष ध्यान दिया जाए, ताकि आने वाली चुनौतियों से निपटा जा सके। देश के जल संसाधनों की यह स्थिति एक गंभीर चेतावनी है, जो यह संकेत देती है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जल संकट भविष्य में और भी विकराल रूप ले सकता है।