निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काइमेट वेदर ने इस वर्ष मानसून को सामान्य से कम रहने की संभावना जताई है। एजेंसी के अनुसार वर्षा दीर्घकालिक औसत के लगभग 94 प्रतिशत के आसपास रह सकती है, जिसमें कुछ प्रतिशत का अंतर संभव है। यह संकेत देता है कि इस बार मानसून पूरी तरह संतोषजनक नहीं रहेगा और कई क्षेत्रों में वर्षा की कमी देखी जा सकती है।
पिछले वर्ष का रिकॉर्ड और इस बार का अंतर
पिछले वर्ष देश में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई थी, जिससे कई क्षेत्रों को लाभ मिला था। सरकारी मौसम विभाग भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार उत्तर-पश्चिमी भाग में वर्षा का स्तर बीते कई वर्षों में सबसे अधिक रहा। वहीं पूर्वोत्तर क्षेत्रों में वर्षा अपेक्षाकृत कम रही थी। इस बार की संभावनाएं पिछले वर्ष की तुलना में कमजोर दिखाई दे रही हैं, जिससे कृषि क्षेत्र में चिंताएं बढ़ गई हैं।
कृषि और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
भारत की कृषि व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा वर्षा पर निर्भर है। देश के लगभग आधे से अधिक खेती योग्य क्षेत्र में सिंचाई के सीमित साधन हैं और वे मानसून पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में मानसून की कमी सीधे उत्पादन पर प्रभाव डाल सकती है। खाद्य उत्पादन में कमी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका है।
अल नीनो का बढ़ता प्रभाव
इस वर्ष मानसून पर अल नीनो के प्रभाव की संभावना जताई जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रशांत महासागर की परिस्थितियां धीरे-धीरे अल नीनो की ओर बढ़ रही हैं, जो सामान्यतः कमजोर मानसून का कारण बनती हैं। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के शुरुआती चरण में इसका प्रभाव सीमित रहेगा, लेकिन वर्ष के दूसरे भाग में इसकी तीव्रता बढ़ सकती है, जिससे वर्षा की अनियमितता बढ़ेगी।
हिंद महासागर की भूमिका और संतुलन की संभावना
मानसून पर केवल प्रशांत महासागर ही नहीं, बल्कि हिंद महासागर की परिस्थितियां भी प्रभाव डालती हैं। यदि हिंद महासागर में सकारात्मक स्थिति विकसित होती है, तो यह अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकती है। हालांकि इस बार इसके सामान्य या हल्के सकारात्मक रहने की संभावना है, जिससे मानसून की शुरुआत तो संतुलित हो सकती है, लेकिन पूरे मौसम में स्थिरता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
क्षेत्रीय असमानता और वर्षा का वितरण
विशेषज्ञों के अनुसार इस बार मानसून का वितरण समान नहीं रहेगा। मध्य और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में वर्षा की कमी देखने को मिल सकती है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में सामान्य वर्षा हो सकती है। जून माह में स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर रहने की संभावना है, लेकिन जुलाई से सितंबर के बीच वर्षा में कमी और अनियमितता बढ़ सकती है। इससे जल प्रबंधन और कृषि योजना पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।