नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने देश की परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता वाले कार्यबल का कार्यकाल जनवरी 2027 तक बढ़ा दिया है। पहले इस कार्यबल को अक्टूबर के अंत तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी, लेकिन अब प्रधानमंत्री कार्यालय ने सिफारिशों को अंतिम रूप देने से पहले राज्यों के नेतृत्व के साथ व्यापक विचार-विमर्श करने का निर्देश दिया है। इसके तहत मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों से परीक्षा संचालन, उपलब्ध संसाधनों, तकनीकी सुविधाओं और प्रशासनिक चुनौतियों पर राय ली जाएगी। सरकार का मानना है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में परीक्षा संबंधी बुनियादी ढांचे की स्थिति एक जैसी नहीं है। महानगरों और बड़े शहरों में जहां आधुनिक परीक्षा केंद्र तथा बेहतर इंटरनेट संपर्क उपलब्ध हैं, वहीं अनेक छोटे शहरों और दूरदराज के जिलों में अब भी पर्याप्त सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में केवल राष्ट्रीय स्तर पर एक समान व्यवस्था लागू करने से क्षेत्रीय असमानताओं की समस्या पूरी तरह दूर नहीं होगी। राज्यों की वास्तविक परिस्थितियों को समझकर तैयार की गई सिफारिशें परीक्षा सुधारों को अधिक व्यावहारिक, समावेशी और प्रभावी बनाने में मदद कर सकती हैं।
तकनीकी सुविधाओं और क्षेत्रीय असमानताओं पर रहेगा विशेष ध्यान
परीक्षा सुधार कार्यबल के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक देशभर में समान स्तर का सुरक्षित और विश्वसनीय परीक्षा ढांचा तैयार करना है। कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं के विस्तार के लिए केवल कंप्यूटर उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि निर्बाध इंटरनेट संपर्क, बिजली की उपलब्धता, तकनीकी सहायता, साइबर सुरक्षा और प्रशिक्षित कर्मचारियों की भी आवश्यकता होगी। कई जिलों में इन सुविधाओं की कमी के कारण अभ्यर्थियों को परीक्षा देने के लिए दूसरे शहरों की यात्रा करनी पड़ती है, जिससे उन पर आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ता है। ग्रामीण तथा दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए यह समस्या और गंभीर हो जाती है। यदि परीक्षा केंद्रों का वितरण समान रूप से नहीं हुआ तो तकनीकी आधारित परीक्षा व्यवस्था भी अवसरों की असमानता को बढ़ा सकती है। इसलिए कार्यबल क्षेत्रीय आवश्यकताओं और प्रशासनिक क्षमता का आकलन करके ऐसी व्यवस्था तैयार करना चाहता है, जिसमें किसी अभ्यर्थी की सफलता उसके निवास स्थान या आर्थिक स्थिति से प्रभावित न हो। परीक्षा व्यवस्था में तकनीक का उपयोग तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ पहुंच, विश्वसनीयता और समान अवसर की गारंटी भी सुनिश्चित की जाए।
नीट-यूजी 2027 में हाइब्रिड परीक्षा व्यवस्था का विकल्प
परीक्षा सुधारों को लेकर विशेषज्ञों और विभिन्न हितधारकों के बीच नीट-यूजी 2027 की परीक्षा प्रणाली को लेकर भी चर्चा हो रही है। कुछ विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि आगामी परीक्षा हाइब्रिड प्रारूप में आयोजित की जाए, ताकि पूरी तरह कंप्यूटर आधारित परीक्षा व्यवस्था लागू करने से पहले आवश्यक तकनीकी ढांचे को मजबूत करने का पर्याप्त समय मिल सके। हाइब्रिड प्रणाली का उद्देश्य पारंपरिक परीक्षा पद्धति और डिजिटल तकनीक के बीच एक व्यावहारिक संक्रमण तैयार करना है। इसके माध्यम से परीक्षा संचालन की नई व्यवस्थाओं का परीक्षण करते हुए उन क्षेत्रों की कमियों को भी पहचाना जा सकता है, जहां कंप्यूटर आधारित परीक्षा के लिए अभी पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, इस प्रारूप को लागू करने से पहले प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा प्रक्रिया की एकरूपता, मूल्यांकन की विश्वसनीयता और तकनीकी समन्वय जैसे पहलुओं पर स्पष्ट नीति बनाना आवश्यक होगा। वर्ष 2028 तक पूरी तरह कंप्यूटर आधारित परीक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ने का विचार तभी सफल हो सकता है, जब उससे पहले देशभर में पर्याप्त संख्या में सुरक्षित और आधुनिक परीक्षा केंद्र स्थापित कर लिए जाएं। इसलिए नीट-यूजी 2027 को संक्रमण काल की परीक्षा के रूप में देखने का सुझाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सार्वजनिक-निजी भागीदारी से बनेगा कंप्यूटर आधारित परीक्षा केंद्रों का नेटवर्क
कार्यबल की प्रमुख सिफारिशों में देशभर में कंप्यूटर आधारित परीक्षा केंद्रों का व्यापक नेटवर्क विकसित करने का प्रस्ताव भी शामिल है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने पर विचार किया जा रहा है। इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे जिलों और कस्बों तक आधुनिक परीक्षा सुविधाएं पहुंचाना है, जहां वर्तमान में सुरक्षित तथा तकनीकी रूप से सक्षम केंद्रों की संख्या सीमित है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से आवश्यक पूंजी जुटाने और बुनियादी ढांचे के विस्तार में तेजी लाई जा सकती है, लेकिन इसके लिए वित्तपोषण, स्वामित्व, संचालन और निगरानी से संबंधित जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण जरूरी होगा। परीक्षा केंद्रों में पर्याप्त कंप्यूटर, सुरक्षित सर्वर व्यवस्था, विश्वसनीय इंटरनेट संपर्क, बिजली के वैकल्पिक साधन और प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी उपलब्ध कराने होंगे। साथ ही परीक्षा की गोपनीयता तथा साइबर सुरक्षा के लिए कठोर मानक लागू करने होंगे। सरकारी निगरानी के अंतर्गत निजी निवेश का उपयोग किया जाता है तो आधुनिक परीक्षा सुविधाओं का विस्तार अपेक्षाकृत तेजी से संभव हो सकता है। इससे अभ्यर्थियों को अपने जिले या नजदीकी क्षेत्र में परीक्षा देने का अवसर मिलेगा और यात्रा पर होने वाला समय तथा खर्च भी कम किया जा सकेगा।
परीक्षा प्रक्रिया की अलग-अलग जिम्मेदारियों से बढ़ेगी जवाबदेही
परीक्षा सुधार कार्यबल परीक्षा आयोजन की मौजूदा व्यवस्था में जिम्मेदारियों का विभाजन करने यानी डिबंडलिंग के प्रस्ताव को भी प्राथमिकता दे रहा है। इसके तहत प्रश्नपत्र तैयार करने, परीक्षा आयोजित करने, परीक्षा केंद्रों के प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था जैसी जिम्मेदारियां अलग-अलग विशेषज्ञ एजेंसियों को सौंपने पर विचार किया जा रहा है। वर्तमान व्यवस्था में यदि किसी एक संस्था पर परीक्षा से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां केंद्रित रहती हैं तो किसी भी स्तर पर हुई चूक का प्रभाव पूरी परीक्षा प्रक्रिया पर पड़ सकता है। जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन होने से प्रत्येक एजेंसी की भूमिका और जवाबदेही निर्धारित की जा सकेगी। इससे परीक्षा संचालन में पारदर्शिता बढ़ाने और अनियमितताओं की आशंका कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, अलग-अलग एजेंसियों के बीच सूचनाओं का सुरक्षित आदान-प्रदान, समयबद्ध समन्वय और आपात परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने की व्यवस्था भी विकसित करनी होगी। प्रश्नपत्र की गोपनीयता से लेकर परीक्षा केंद्रों की निगरानी तक प्रत्येक चरण के लिए स्पष्ट मानक तय करना आवश्यक होगा। यह सुधार तभी प्रभावी होगा, जब जिम्मेदारियों का विभाजन केवल प्रशासनिक औपचारिकता न बनकर जवाबदेही और स्वतंत्र निगरानी की मजबूत व्यवस्था में परिवर्तित हो।
साझा परीक्षा कैलेंडर और जिला स्तर पर केंद्रों से अभ्यर्थियों को राहत
कार्यबल देशभर में प्रत्येक जिले में परीक्षा केंद्र स्थापित करने और प्रमुख भर्ती तथा प्रवेश परीक्षाओं के लिए साझा कैलेंडर तैयार करने के विकल्प पर भी विचार कर रहा है। इस प्रस्ताव में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान (IBPS) और रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB) जैसी संस्थाओं की परीक्षाओं को एक समन्वित समय-सारणी के अंतर्गत लाने की संभावना शामिल है। वर्तमान में अलग-अलग परीक्षाओं की तारीखों में टकराव होने से विद्यार्थियों और सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं को कई बार महत्वपूर्ण अवसरों में से किसी एक को चुनने की मजबूरी का सामना करना पड़ता है। साझा कैलेंडर से परीक्षा तिथियों के बेहतर समन्वय के साथ परीक्षा केंद्रों, कर्मचारियों और तकनीकी संसाधनों का भी अधिक प्रभावी उपयोग किया जा सकेगा। जिला स्तर पर पर्याप्त परीक्षा केंद्र उपलब्ध होने से दूरदराज के अभ्यर्थियों को बार-बार बड़े शहरों की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी। हालांकि, अलग-अलग संस्थाओं की भर्ती प्रक्रिया, परीक्षा चक्र और प्रशासनिक आवश्यकताओं को देखते हुए साझा कैलेंडर तैयार करना एक जटिल कार्य होगा। इसके लिए संस्थागत समन्वय, समयबद्ध योजना और नियमित समीक्षा की आवश्यकता होगी। यदि इन प्रस्तावों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो देश की प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और अभ्यर्थी केंद्रित बन सकती है।