नई दिल्ली. एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने आज 31 अक्टूबर को भारतीय वायुसेना के 29वें प्रमुख का पद संभाल लिया। दिसंबर 2028 तक का उनका कार्यकाल महत्वपूर्ण निर्णयों से भरा रहेगा। लड़ाकू विमानों की कमी दूर करने से लेकर आधुनिक युद्ध की जरूरतों तक कई चुनौतियां सामने हैं। चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती से निपटने के लिए क्षमता बढ़ाना प्राथमिकता रहेगी। उनके फैसलों से वायुसेना की भविष्य की युद्धक तैयारियों की दिशा तय होगी। नई जिम्मेदारी के साथ बड़े एजेंडे पर काम शुरू हो गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से यह कार्यकाल निर्णायक साबित हो सकता है।
लड़ाकू स्क्वाड्रन की कमी
भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रनों की कमी है। मिग-21 विमानों की सेवा से विदाई के बाद वायुसेना के पास केवल 29 स्क्वाड्रन रह गए हैं जबकि स्वीकृत संख्या 42 है। चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती को देखते हुए यह कमी चिंता का विषय है। पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा था कि हर साल 36 से 40 नए लड़ाकू विमानों की जरूरत है। विमानों की खरीद के साथ घरेलू उत्पादन बढ़ाना भी जरूरी है। स्क्वाड्रन संख्या बढ़ाने पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
तेजस मार्क-1ए का समावेश
तेजस मार्क-1ए लड़ाकू विमानों को वायुसेना में शामिल करना पहला बड़ा कदम है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल को करीब 180 तेजस मार्क-1ए विमानों का उत्पादन करना है। वायुसेना को उम्मीद है कि कंपनी हर साल 24 विमान उपलब्ध करा सकेगी। रडार और मिसाइलों के एकीकरण से जुड़ी तकनीकी समस्याओं को नवंबर तक दूर करने की योजना है। एचएएल के पास करीब 30 एयरफ्रेम तैयार हैं और अमेरिका से जीई-404 इंजनों की पहली 14 इकाइयां मिल चुकी हैं। नए प्रमुख के कार्यकाल के शुरुआती महीनों में पहला स्क्वाड्रन शामिल होने की संभावना है।
राफेल और एस-400 की भूमिका
राफेल विमानों की अतिरिक्त संख्या और एस-400 वायु रक्षा प्रणाली की क्षमता बढ़ाने जैसे मुद्दे भी एजेंडे में हैं। ये प्लेटफॉर्म वायुसेना की मारक क्षमता और रक्षा कवर को मजबूत करते हैं। मौजूदा बेड़े को और प्रभावी बनाने के लिए इनका विस्तार जरूरी है। दोहरी सीमा चुनौती के मद्देनजर इन प्रणालियों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। रखरखाव और अतिरिक्त यूनिट्स की योजना पर काम करना होगा। आधुनिक हथियार प्रणालियों का एकीकरण प्राथमिकता में रहेगा।
पांचवीं पीढ़ी और ड्रोन क्षमता
पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान पर फैसला लेना दीर्घकालिक चुनौती है। ड्रोन और मानवरहित प्रणालियों की क्षमता बढ़ाना आधुनिक युद्ध की जरूरत है। बदलते युद्ध परिदृश्य में ये तकनीकें निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। स्वदेशी विकास और विदेशी सहयोग दोनों विकल्पों पर विचार करना होगा। ड्रोन वारफेयर को मुख्यधारा में लाने की योजना आगे बढ़ानी होगी। भविष्य की वायुसेना को इन क्षमताओं से लैस करना अनिवार्य है।
थिएटर कमान और अग्निवीर चुनौती
प्रस्तावित थिएटर कमान व्यवस्था को लागू करना संगठनात्मक चुनौती है। अग्निवीर व्यवस्था के तहत भर्ती और प्रशिक्षण प्रणाली को वायुसेना की जरूरतों के अनुरूप ढालना होगा। तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय के लिए थिएटर कमान महत्वपूर्ण है। नए प्रमुख को इन सुधारों को समय पर आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी निभानी होगी। कार्मिक नीति और संयुक्त युद्ध क्षमता दोनों पर ध्यान देना होगा। समग्र सैन्य सुधारों में वायुसेना की भूमिका तय करनी होगी।