2025 में भारत दुनिया में सबसे ज्यादा बच्चों के जन्म वाला देश बना रहा। अनुमान के अनुसार करीब 2.3 करोड़ बच्चों का जन्म भारत में हुआ—यानी हर छठा बच्चा भारत में जन्मा। इसका बड़ा कारण देश की विशाल युवा आबादी, जनसांख्यिकीय विविधता और ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी अपेक्षाकृत ऊंची जन्म दर है। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बढ़ती आबादी के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी बुनियादी सुविधाओं का दबाव भी तेज़ी से बढ़ रहा है।
एशिया–अफ्रीका: भविष्य की जनसंख्या का सबसे बड़ा केंद्र
2025 में पूरी दुनिया में लगभग 13.2 करोड़ बच्चों का जन्म हुआ, जिनमें सबसे बड़ा हिस्सा एशिया और अफ्रीका से रहा।
चीन अब भी दूसरे स्थान पर रहा, लेकिन यहां जन्म दर लगातार गिरावट में है और 2025 में केवल 87 लाख जन्म दर्ज हुए। वहीं नाइजीरिया ने 76 लाख जन्मों के साथ तेज़ी से उभरती जनसंख्या शक्ति का परिचय दिया। पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, कांगो और इथियोपिया जैसे देशों में भी जन्म दर वैश्विक औसत से ऊपर रही—जिससे संकेत मिलता है कि आने वाले दशकों में वैश्विक जनसंख्या का गुरुत्व–केंद्र दक्षिण और पूर्व की ओर खिसकता रहेगा।
नाइजीरिया: अफ्रीका की बढ़ती जनसांख्यिकीय ताकत
अफ्रीका का सबसे बड़ा देश नाइजीरिया जनसंख्या वृद्धि के मामले में वैश्विक सुर्खियों में है। 2025 में यहां जन्मों की संख्या पूरे यूरोप से अधिक रही। देश में उच्च प्रजनन दर, युवा आबादी का बड़ा आधार और तेजी से शहरीकरण इस वृद्धि के प्रमुख कारण हैं। हालांकि तेजी से बढ़ती आबादी के बीच स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार का संतुलन बनाए रखना सरकार के सामने बड़ी चुनौती है।
यूरोप और जापान: घटती जन्मदर ने बढ़ाई चिंता
यूरोप के अधिकांश विकसित देशों में 2025 में जन्म दर चिंताजनक रूप से नीचे रही। जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली जैसे देशों में वार्षिक जन्म 7.5 लाख से कम रहे। जापान में भी स्थिति और खराब है—जहां जन्म आंकड़ा इसी स्तर से नीचे फिसल चुका है। इन देशों में वर्कफोर्स घटने, बुजुर्ग आबादी बढ़ने और अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। सरकारें आर्थिक प्रोत्साहन, पेरेंटल बेनिफिट और इमिग्रेशन नीतियों के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश कर रही हैं।
जनसांख्यिकीय संतुलन—भविष्य की सबसे बड़ी नीति चुनौती
रिपोर्ट साफ करती है कि आने वाले दशकों में दुनिया दो हिस्सों में बंटती दिखाई देगी—एक ओर युवा और तेजी से बढ़ती आबादी वाले देश, दूसरी ओर तेजी से बुढ़ाते समाज। जहां विकासशील देशों के सामने संसाधनों का दबाव बढ़ेगा, वहीं विकसित देशों के सामने श्रम की कमी और आर्थिक सुस्ती की चुनौती रहेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि जनसंख्या प्रबंधन, शिक्षा निवेश और हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर वैश्विक नीति–निर्माण का बड़ा फोकस बनने वाला है।
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