'एक देश, एक चुनाव' (One Nation One Election) से जुड़े विधेयक को मौजूदा संसद के मॉनसून सत्र में पेश नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही इस सत्र में इस प्रस्ताव पर चर्चा की भी संभावना समाप्त हो गई है। सरकार ने विधेयक की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का कार्यकाल बढ़ा दिया है। अब समिति अपनी रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र 2026 के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक सौंपेगी। इसके बाद ही विधेयक पर आगे की संसदीय प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद है।
लोकसभा में ध्वनि मत से मिली मंजूरी
संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के अध्यक्ष और भाजपा सांसद पीपी चौधरी ने लोकसभा में समिति का कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव रखा। सदन ने इसे ध्वनि मत से मंजूरी दे दी। इसके बाद साफ हो गया कि समिति अपनी रिपोर्ट मॉनसून सत्र में पेश नहीं करेगी।
'एक देश, एक चुनाव' क्यों लाना चाहती है सरकार?
सरकार का मानना है कि पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से कई फायदे होंगे।
चुनावों पर होने वाला सरकारी खर्च कम होगा।
सुरक्षा बलों और प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा।
बार-बार लागू होने वाली आचार संहिता से विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे।
प्रशासनिक स्थिरता और नीति निर्माण में निरंतरता बनी रहेगी।
बार-बार चुनाव होने से होने वाली मतदाता थकान (Voter Fatigue) कम होगी।
चुनावी विवादों और न्यायालयों पर पड़ने वाला बोझ घट सकता है।
'एक देश, एक चुनाव' की प्रमुख चुनौतियां
हालांकि इस प्रस्ताव के सामने कई संवैधानिक और प्रशासनिक चुनौतियां भी हैं।
सभी राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल एक समान करना आसान नहीं है।
संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता पड़ सकती है।
राष्ट्रपति शासन के संभावित दुरुपयोग को लेकर भी चिंताएं जताई जाती रही हैं।
देशभर में एक साथ चुनाव कराने के लिए भारी संख्या में मतदान केंद्र, ईवीएम, सुरक्षा बल और चुनाव कर्मियों की जरूरत होगी।
2024 के आंकड़ों के अनुसार 96 करोड़ से अधिक मतदाताओं के लिए एक साथ चुनाव कराना बड़ी प्रशासनिक चुनौती माना जाता है।
अब आगे क्या होगा?
संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट शीतकालीन सत्र से पहले संसद को सौंपेगी। रिपोर्ट पर विचार के बाद सरकार विधेयक को संसद में पेश कर सकती है। इसके बाद दोनों सदनों में चर्चा और पारित होने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।