नई दिल्ली - भारत के कच्चे तेल आयात को लेकर केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर फैसले लेता है। उन्होंने संकेत दिया कि फिलहाल रूसी तेल का आयात घटाने के लिए भारत पर अमेरिकी दबाव की स्थिति पहले जैसी नहीं है। मंत्री के मुताबिक, मध्य-पूर्व से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ने और कीमतों में बदलाव के कारण भारत के तेल आयात का स्वरूप भी बदल रहा है।
रूसी तेल की खरीद में क्यों आई कमी?
एक कार्यक्रम में हरदीप पुरी ने बताया कि यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बेहद कम थी। उन्होंने कहा कि उस समय भारत अपनी जरूरत का लगभग 0.2 प्रतिशत कच्चा तेल ही रूस से आयात करता था। हालांकि, युद्ध के बाद रूसी तेल पर मिलने वाली छूट के चलते भारत ने वहां से खरीद बढ़ा दी।
अब बाजार में उपलब्ध विकल्पों और कीमतों के आधार पर रिफाइनरियां अपनी खरीद की रणनीति बदल रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मध्य-पूर्व से कच्चे तेल की आपूर्ति में बढ़ोतरी के साथ भारत का आयात युद्ध-पूर्व के स्तर के करीब पहुंचा है। वहीं, चीन से प्रतिस्पर्धा और तेल की कीमतों में अंतर ने रूसी तेल की खरीद को प्रभावित किया है।
खाड़ी देशों के तेल की ओर बढ़ा रिफाइनरियों का रुझान
रिपोर्ट में बताया गया है कि रूसी तेल की खरीद मुख्य रूप से उसकी कीमत और दूसरे विकल्पों की तुलना में मिलने वाली छूट पर निर्भर करती है। यदि खाड़ी देशों से प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल उपलब्ध होता है, तो रिफाइनरियां वहां से खरीद बढ़ा सकती हैं।
इसका मतलब है कि रूसी तेल का आयात केवल राजनीतिक दबाव से तय नहीं होता, बल्कि वैश्विक बाजार, परिवहन, आपूर्ति की उपलब्धता और कीमतें भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हरदीप पुरी ने कहा कि आखिरकार, हर देश अपने हितों को ध्यान में रखकर ही फैसले करता है। भारत की ऊर्जा नीति में भी आर्थिक जरूरतों और आपूर्ति की निरंतरता को प्राथमिकता दी जाती है।
अमेरिकी शुल्क और प्रतिबंधों का क्या है मामला?
खबर में दिए गए विवरण के मुताबिक, अक्टूबर की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रीय हित से जुड़े प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए रूसी ऊर्जा निर्यात पर प्रस्तावित नए प्रतिबंधों और शुल्कों को हटाने से संबंधित कदम उठाया। इससे भारत पर संभावित रूप से लगाए जाने वाले 100 प्रतिशत तक के शुल्क का खतरा कम होने की बात कही गई है।
हालांकि, इस दावे और संबंधित अमेरिकी कानून के प्रावधानों की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा व्यापार से जुड़े फैसलों का असर कच्चे तेल की खरीद, कीमतों और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों पर पड़ सकता है।
भारत की ऊर्जा कूटनीति पर क्या बोले हरदीप पुरी?
हरदीप पुरी ने सितंबर में कहा था कि भारत ने भू-राजनीतिक संकटों और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाओं के बावजूद ऊर्जा आयात को बनाए रखने में सफलता हासिल की है। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की ऊर्जा कूटनीति का परिणाम बताया था।
मंत्री के अनुसार, ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ केवल तेल और गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करना नहीं है। इसमें अंतरराष्ट्रीय संघर्षों, मुश्किल परिवहन मार्गों, कीमतों में उतार-चढ़ाव और अचानक पैदा होने वाली बाधाओं के बीच देश की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाना भी शामिल है।
वैश्विक ऊर्जा मांग में भारत की बढ़ती भूमिका
केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि भारत वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आने वाले दो दशकों में दुनिया की ऊर्जा मांग में होने वाली कुल वृद्धि का लगभग एक-चौथाई हिस्सा भारत से आने का अनुमान है।
बढ़ती अर्थव्यवस्था और ऊर्जा की जरूरतों को देखते हुए भारत के लिए तेल के अलग-अलग स्रोतों तक पहुंच बनाए रखना महत्वपूर्ण है। ऐसे में रूसी तेल, मध्य-पूर्व के उत्पादकों और अन्य आपूर्तिकर्ताओं के बीच संतुलन बनाना देश की ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा बना हुआ है।