नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को एक कमेटी बनाने का निर्देश दिया। यह कमेटी सुझावों पर विचार करेगी और सरकार को सिफारिशें देगी ताकि यह पक्का किया जा सके कि फार्मास्युटिकल कंपनियां अनैतिक मार्केटिंग तरीकों का इस्तेमाल न करें। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने एक याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में मांग की गई थी कि जब तक कोई असरदार कानून नहीं बन जाता तब तक सुप्रीम कोर्ट दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग प्रैक्टिस को कंट्रोल और रेगुलेट करने के लिए गाइडलाइंस तय करे। अदालत ने सरकार को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि कमेटी सुझावों और विचारों पर विचार करेगी तथा अपनी सिफारिशें सौंपेगी।
केंद्र का रुख और तीन सदस्यीय पैनल
8 सितंबर को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वह एक तीन-सदस्यीय पैनल बना रही है। यह पैनल एक कानूनी ढांचा बनाने का सुझाव देगा ताकि यह पक्का किया जा सके कि दवा कंपनियां अनैतिक काम न करें। मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने दो महीने का समय मांगा था ताकि समिति अपनी रिपोर्ट सौंप सके और उसे मंजूरी के लिए अदालत के सामने रखा जा सके। केंद्र सरकार इस बात पर सहमत थी कि यह पक्का करने के लिए सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत है कि दवा कंपनियां किसी भी तरह के अनैतिक काम न करें। सरकार ने विस्तार से चर्चा का उल्लेख करते हुए संभावित समाधान खोजने का वादा किया।
मौजूदा कोड और समिति की भूमिका
सरकार ने यह भी कहा कि जब तक रिपोर्ट नहीं मिल जाती और उस पर कोई फैसला नहीं हो जाता तब तक यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज 2024 ही इस क्षेत्र के लिए लागू रहेगा। समिति से कहा गया है कि वह इस बात पर अपनी रिपोर्ट दे कि क्या दवा कंपनियां ऐसी अनैतिक गतिविधियों में शामिल हो सकती हैं और अगर हां तो उन्हें रोकने के लिए क्या कानूनी ढांचा बनाया जा सकता है। अदालत ने केंद्र के अनुपालन हलफनामे पर विचार करने के लिए मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी तय की है। समिति की सिफारिशें सरकार के लिए मार्गदर्शक साबित होंगी।
अनैतिक प्रैक्टिस पर चिंता
फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को उपहार या अन्य लाभ देकर दवाओं के प्रचार-प्रसार की प्रथा लंबे समय से चर्चा में रही है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि जब तक प्रभावी कानून नहीं आता तब तक अदालत को अंतरिम दिशानिर्देश जारी करने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए सरकार को सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया है। कमेटी के गठन से पारदर्शी और नैतिक मार्केटिंग व्यवस्था सुनिश्चित होने की उम्मीद है। स्वास्थ्य क्षेत्र में मरीजों के हितों की रक्षा के लिए यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आगे की प्रक्रिया और समयसीमा
बेंच ने अपना आदेश सुनाते हुए कहा कि हमने भारत सरकार को एक कमेटी बनाने का निर्देश दिया है। यह कमेटी सुझावों और विचारों पर विचार करेगी और उसके बाद भारत सरकार को अपनी सिफारिशें सौंपेगी। केंद्र को दो महीने का समय पहले ही मिल चुका है और अब अदालत अनुपालन पर नजर रखेगी। 29 जनवरी की सुनवाई में सरकार को कमेटी की प्रगति और सिफारिशों की जानकारी देनी होगी। फार्मा उद्योग में नैतिक मानकों को मजबूत करने की दिशा में यह आदेश एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। मरीजों और डॉक्टरों दोनों के हित में पारदर्शी व्यवस्था की जरूरत को अदालत ने रेखांकित किया है।