सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवाद और बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में POCSO एक्ट के संभावित दुरुपयोग को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि बच्चे के यौन शोषण जैसे गंभीर आरोपों को माता-पिता के बीच कानूनी लड़ाई में बढ़त हासिल करने के साधन के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO के तहत शिकायत होने मात्र से आरोपी माता-पिता की गिरफ्तारी को रूटीन प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता। गिरफ्तारी से पहले मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों की गंभीरता से जांच जरूरी होगी।
9 साल की बच्ची से जुड़े मामले में आया फैसला
यह मामला एक वैवाहिक और कस्टडी विवाद से जुड़ा था, जिसमें पिता पर अपनी नाबालिग बेटी के यौन शोषण का आरोप लगाया गया था। मामले में CBI जांच के बाद आरोपों को सही नहीं पाया गया और सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित POCSO FIR को रद्द कर दिया। कोर्ट ने बच्ची की कस्टडी पिता के पक्ष में रखने का निर्देश दिया।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के बीच विवाद का असर बच्चे पर गंभीर पड़ सकता है। ऐसे मामलों में बच्चे को बार-बार जांच या मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन से गुजारने से भी बचना चाहिए और बच्चे के हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
गिरफ्तारी से पहले बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ की राय
कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, वैवाहिक विवाद या कस्टडी संघर्ष से जुड़े POCSO मामलों में गिरफ्तारी से पहले बाल मनोवैज्ञानिक, बाल मनोचिकित्सक या बाल मानसिक स्वास्थ्य में विशेषज्ञता रखने वाले योग्य पेशेवर की राय लेने की प्रक्रिया अपनाई जानी है।
जांच अधिकारी को विशेषज्ञ की रिपोर्ट के साथ-साथ मामले में उपलब्ध अन्य साक्ष्यों पर भी विचार करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी की शक्ति होना और उस शक्ति का इस्तेमाल करना दो अलग बातें हैं।
बच्चे के मूल्यांकन में भी रखनी होगी सावधानी
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के संबंध में minimum intrusion और minimum exposure के सिद्धांत पर जोर दिया है। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की मनोवैज्ञानिक जांच तभी कराई जानी चाहिए, जब उसकी वास्तविक आवश्यकता हो और उसके उद्देश्य तथा जरूरत के कारण स्पष्ट हों।बार-बार या कई स्तरों पर बच्चे का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन सामान्य तौर पर नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कोई ठोस परिस्थिति इसकी मांग न करे।
सीधे कोर्ट में शिकायत आने पर भी सावधानी
अगर माता-पिता BNSS के तहत सीधे अदालत में शिकायत दाखिल करते हैं, तो अदालत को भी मामले पर संज्ञान लेने और आरोपी को समन जारी करने से पहले बच्चे के मूल्यांकन की जरूरत पर विचार करना होगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उद्देश्य ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ बच्चे के हित और मानसिक सुरक्षा को भी ध्यान में रखना है।
सभी राज्यों और हाईकोर्ट तक पहुंचेगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों को संबंधित न्यायिक और पुलिस तंत्र तक पहुंचाने पर भी जोर दिया है। फैसले की जानकारी संबंधित राज्यों और हाईकोर्ट तक पहुंचाने की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि ऐसे मामलों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जा सके।