नई दिल्ली. देश की सर्वोच्च अदालत ने एक जनहित याचिका को सख्ती के साथ खारिज कर दिया, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ‘राष्ट्र पुत्र’ घोषित करने की मांग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि इस प्रकार के विषय न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आते और इन्हें उचित प्रशासनिक या विधायी मंच पर उठाया जाना चाहिए।
याचिका में उठाई गई प्रमुख मांगें
दायर याचिका में यह भी दावा किया गया था कि आजाद हिंद फौज ने भारत को स्वतंत्रता दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। साथ ही, 21 अक्टूबर 1943 को राष्ट्रीय दिवस घोषित करने और 23 जनवरी, जो नेताजी की जयंती है, को भी राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाने की मांग की गई थी। अदालत ने इन सभी मांगों को अस्वीकार करते हुए याचिका को निराधार माना।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इसी याचिकाकर्ता द्वारा पहले भी इसी प्रकार की याचिका दायर की जा चुकी है, जिसे अदालत पहले ही खारिज कर चुकी है। उस समय भी यह स्पष्ट किया गया था कि ऐसे मुद्दे न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत नहीं आते हैं।
पब्लिसिटी के लिए याचिका दायर करने पर नाराजगी
अदालत ने इस बात पर भी गंभीर आपत्ति जताई कि पहले खारिज हो चुकी याचिका के बावजूद इसे दोबारा दायर किया गया। पीठ ने टिप्पणी की कि यह कदम केवल प्रचार पाने के उद्देश्य से उठाया गया प्रतीत होता है। अदालत ने इस प्रकार की प्रवृत्ति को अनुचित बताते हुए कड़ा रुख अपनाया।
जुर्माने की चेतावनी और भविष्य के लिए निर्देश
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता को स्पष्ट चेतावनी दी कि भविष्य में यदि ऐसी तुच्छ याचिकाएं दायर की गईं, तो उस पर आर्थिक दंड लगाया जाएगा। साथ ही अदालत ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस प्रकार के समान मुद्दों पर दायर होने वाली याचिकाओं पर विचार न किया जाए। अंत में अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि अब याचिकाकर्ता जाए, अन्यथा उस पर अतिरिक्त जुर्माना लगाया जा सकता है।