नई दिल्ली. भारत की हजारों वर्ष पुरानी ज्ञान परंपरा और ऐतिहासिक विरासत को वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण सम्मान मिला है। विश्व के सबसे विशाल महाकाव्यों में शामिल महाभारत के साथ कश्मीर के इतिहास का प्रामाणिक दस्तावेज माने जाने वाले राजतरंगिणी और प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था का विश्लेषण करने वाले कौटिल्य के अर्थशास्त्र की पांडुलिपियों को यूनेस्को के 'मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर' में शामिल किया गया है। यह निर्णय इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित रजिस्टर के 11वें सत्र में लिया गया। इस उपलब्धि को भारतीय साहित्य, इतिहास, दर्शन और प्रशासनिक चिंतन की समृद्ध परंपरा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इन तीनों ग्रंथों की विशेषता यह है कि ये भारतीय समाज के अलग-अलग ऐतिहासिक कालखंडों, जीवन मूल्यों और बौद्धिक विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं।
यूनेस्को के स्मृति रजिस्टर में शामिल होने का क्या है महत्व?
यूनेस्को का स्मृति कार्यक्रम विश्व की ऐसी महत्वपूर्ण दस्तावेजी और पांडुलिपि विरासत के संरक्षण, संवर्धन तथा अंतरराष्ट्रीय पहचान के लिए संचालित किया जाता है, जिसका मानवता के इतिहास और सामूहिक स्मृति में विशेष महत्व है। इसके अंतर्गत दुर्लभ पांडुलिपियों, ऐतिहासिक अभिलेखों, दस्तावेजों और अन्य महत्वपूर्ण ज्ञान-संपदाओं को पहचान प्रदान की जाती है। एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर इसी व्यापक कार्यक्रम का क्षेत्रीय स्वरूप है। किसी ग्रंथ या पांडुलिपि का इसमें शामिल होना उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक महत्ता की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति को दर्शाता है। भारत के तीन महत्वपूर्ण ग्रंथों को एक साथ इस सूची में स्थान मिलना इसलिए भी उल्लेखनीय है, क्योंकि ये साहित्यिक कल्पना, ऐतिहासिक अभिलेखन और राज्य संचालन जैसे तीन अलग-अलग ज्ञान क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे भारतीय पांडुलिपि परंपरा के संरक्षण और उसके अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक जगत में नई गति मिलने की संभावना है।
महाभारत: युद्ध की कथा से कहीं व्यापक है जीवन और धर्म का दर्शन
महाभारत को विश्व साहित्य के सबसे विशाल और प्रभावशाली महाकाव्यों में गिना जाता है। इसकी कथा कुरुक्षेत्र के युद्ध और कौरव-पांडव संघर्ष के इर्द-गिर्द विकसित होती है, लेकिन इसका वास्तविक विस्तार मानवीय जीवन के लगभग हर महत्वपूर्ण प्रश्न तक पहुंचता है। धर्म और अधर्म, न्याय और अन्याय, सत्ता और नैतिकता, कर्तव्य और अधिकार तथा परिवार और समाज के बीच उत्पन्न होने वाले संघर्षों का इसमें गहन विश्लेषण मिलता है। महाभारत का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक अंश भगवद्गीता है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, कर्तव्य, आत्मा और निष्काम भाव का संदेश दिया है। इस महाकाव्य की विशेषता यह है कि इसमें पात्रों को केवल आदर्श या खलनायक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया, बल्कि उनकी परिस्थितियों, निर्णयों और नैतिक द्वंद्वों के माध्यम से मानवीय स्वभाव की जटिलताओं को सामने रखा गया है। यही कारण है कि महाभारत भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति का अभिन्न अंग होने के साथ-साथ विश्व साहित्य और दर्शन के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
राजतरंगिणी: 12वीं शताब्दी में कश्मीर के इतिहास को मिला था व्यवस्थित स्वरूप
कश्मीर के विद्वान इतिहासकार कल्हण द्वारा 12वीं शताब्दी में संस्कृत भाषा में रचित राजतरंगिणी भारतीय इतिहास लेखन की अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है। इस ग्रंथ में कश्मीर के प्राचीन राजाओं, उनके शासनकाल, राजनीतिक संघर्षों, सामाजिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक विकास का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कल्हण ने इतिहास को केवल राजाओं की प्रशस्ति के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उपलब्ध परंपराओं, ऐतिहासिक विवरणों और घटनाओं की आलोचनात्मक पड़ताल के आधार पर अतीत को समझने का प्रयास किया। राजतरंगिणी को भारतीय इतिहास लेखन की विशिष्ट परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। इसमें तत्कालीन कश्मीर की राजनीतिक परिस्थितियों के साथ-साथ समाज, धर्म, संस्कृति और प्रशासन की भी झलक मिलती है। इस ग्रंथ को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने से कश्मीर की ऐतिहासिक और साहित्यिक विरासत के संरक्षण तथा वैश्विक अकादमिक अध्ययन को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र: प्राचीन भारत की शासन और कूटनीति का अद्भुत दस्तावेज
कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र प्राचीन भारत की राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक समझ का महत्वपूर्ण प्रमाण है। इस ग्रंथ में राज्य की संरचना, राजा के दायित्व, प्रशासनिक व्यवस्था, राजस्व संग्रह, व्यापार, कृषि, न्याय व्यवस्था, कूटनीति और सैन्य रणनीति जैसे विषयों का विस्तार से विवेचन किया गया है। कौटिल्य ने शासन को केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे राज्य की सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और नागरिकों के कल्याण से जोड़कर देखा। इसमें अधिकारियों की जवाबदेही, राजकोष के प्रबंधन, आर्थिक गतिविधियों के नियमन और पड़ोसी राज्यों के साथ संबंधों को लेकर भी व्यवस्थित विचार प्रस्तुत किए गए हैं। आधुनिक राजनीतिक विज्ञान, अर्थनीति और प्रशासनिक अध्ययन में भी इस ग्रंथ का उल्लेख महत्वपूर्ण माना जाता है। यूनेस्को के क्षेत्रीय स्मृति रजिस्टर में इसकी पांडुलिपि को स्थान मिलना प्राचीन भारतीय प्रशासनिक चिंतन की उस परंपरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान देता है, जिसने शासन और राज्य संचालन पर गंभीर बौद्धिक विमर्श विकसित किया था।
तीनों ग्रंथों की पांडुलिपियां कहां हैं संरक्षित?
इस अंतरराष्ट्रीय मान्यता की एक विशेष बात यह भी है कि इसमें केवल तीन प्रसिद्ध ग्रंथों के नाम ही शामिल नहीं किए गए हैं, बल्कि उनसे संबंधित विशिष्ट ऐतिहासिक पांडुलिपियों को पहचान मिली है। उपलब्ध प्रमाणपत्रों के अनुसार, महाभारत की भोजपत्र पर लिखी पांडुलिपि पुणे स्थित भांडारकर प्राच्यविद्या अनुसंधान संस्थान में संरक्षित है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र की प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपि मैसूर स्थित प्राच्य अनुसंधान संस्थान में रखी गई है। वहीं, कल्हण की राजतरंगिणी की पांडुलिपि श्रीनगर के श्री प्रताप सिंह पुस्तकालय परिसर स्थित प्राच्य अनुसंधान पुस्तकालय में संरक्षित है। इन पांडुलिपियों का ऐतिहासिक महत्व केवल इनके विषय तक सीमित नहीं है, बल्कि इनकी लिपि, लेखन सामग्री, संरक्षण परंपरा और ऐतिहासिक यात्रा भी शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय हैं। इनका अंतरराष्ट्रीय रजिस्टर में शामिल होना भारत की दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण, सूचीकरण और डिजिटलीकरण की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।
क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की कुल प्रविष्टियां हुईं छह
इस नई उपलब्धि के साथ यूनेस्को के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय स्मृति रजिस्टर में भारत की कुल प्रविष्टियों की संख्या बढ़कर 6 हो गई है। इससे पहले वर्ष 2024 में तुलसीदास कृत रामचरितमानस की चित्रित पांडुलिपियों, पंचतंत्र की 15वीं शताब्दी की दुर्लभ पांडुलिपि और भारतीय काव्यशास्त्र से संबंधित सहृदयालोक-लोचन को इस क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल किया गया था। इन छह प्रविष्टियों के माध्यम से भारतीय साहित्य, लोकज्ञान, दर्शन, इतिहास और बौद्धिक परंपरा के अलग-अलग पक्षों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने तीनों नई पांडुलिपियों के नामांकन से जुड़े दस्तावेज तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उपलब्धि इस बात की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है कि भारत के पुस्तकालयों, शोध संस्थानों, मठों और निजी संग्रहों में आज भी बड़ी संख्या में ऐसी पांडुलिपियां मौजूद हैं, जिनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व व्यापक है। उनका व्यवस्थित संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान के नए द्वार खोल सकता है।
विश्व धरोहर की इस मान्यता से संरक्षण और शोध को मिलेगी नई गति
भारत की प्राचीन पांडुलिपियों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना केवल सांस्कृतिक गौरव का विषय नहीं, बल्कि ज्ञान-संपदा के संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण अवसर है। समय, जलवायु, नमी, कीटों और अनुचित रखरखाव के कारण अनेक प्राचीन पांडुलिपियां धीरे-धीरे नष्ट होने के खतरे का सामना कर रही हैं। भोजपत्र और ताड़पत्र जैसी पारंपरिक लेखन सामग्रियों से तैयार दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए विशेष वैज्ञानिक तकनीकों और नियंत्रित वातावरण की आवश्यकता होती है। यूनेस्को के स्मृति कार्यक्रम का व्यापक उद्देश्य ऐसी दस्तावेजी विरासत की पहचान, सुरक्षा और उस तक पहुंच को बढ़ावा देना है। हालांकि, इस क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल होना अपने आप में किसी पांडुलिपि के संरक्षण की गारंटी या उसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा देना नहीं है। वास्तविक उपलब्धि तब और व्यापक होगी, जब इन दुर्लभ दस्तावेजों का बेहतर संरक्षण, उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटलीकरण और शोधकर्ताओं तथा आम पाठकों के लिए सुलभ अध्ययन सुनिश्चित किया जा सकेगा।