जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि पत्नी के सैलरी अकाउंट का ATM कार्ड अपने पास रखकर उसकी कमाई जबरन निकालना, उसके चरित्र पर झूठे आरोप लगाना और निजी जानकारी हासिल करने के लिए RTI का इस्तेमाल करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने पति की अपील खारिज करते हुए अलवर फैमिली कोर्ट-2 के तलाक के आदेश को बरकरार रखा है।
पत्नी की सैलरी पर पति का था नियंत्रण
मामले में पत्नी ने आरोप लगाया था कि पति उसका ATM कार्ड अपने पास रखता था और उसके सैलरी अकाउंट से पैसे निकालता था। पत्नी को अपना ATM कार्ड खुद के पास रखने की भी अनुमति नहीं थी।पत्नी ने फैमिली कोर्ट में अपने बयान और जिरह के दौरान इन तथ्यों को रखा था। हाईकोर्ट ने भी पति के इस व्यवहार को वैवाहिक संबंधों में मानसिक क्रूरता के पहलू पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना।
सहकर्मियों से अवैध संबंध के लगाए झूठे आरोप
पत्नी ने यह भी आरोप लगाया था कि पति उस पर अपने सहकर्मियों के साथ अवैध संबंध होने के झूठे आरोप लगाता था। इससे उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ा।हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी ने फैमिली कोर्ट में पति की ओर से लगाए गए आरोपों का तथ्यों के साथ खंडन किया था। अदालत ने पति के व्यवहार और उसके आरोपों को वैवाहिक संबंधों में क्रूरता के मामले के रूप में देखा।
निजी जानकारी के लिए RTI लगाने को भी माना गलत
इस मामले में पति ने पत्नी की मेडिकल और सैलरी से संबंधित निजी जानकारी हासिल करने के लिए RTI आवेदन भी लगाए थे। इससे जुड़े तथ्य अदालत के रिकॉर्ड में मौजूद थे।हाईकोर्ट ने इस व्यवहार को भी वैवाहिक विवाद के दौरान पत्नी की निजता और मानसिक शांति से जुड़े महत्वपूर्ण पहलू के रूप में देखा।
2018 से अलग रह रहे पति-पत्नी, दो बेटियां मां के साथ
पत्नी की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि दोनों की शादी 6 फरवरी 2010 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। इस दंपती की दो बेटियां हैं, जो अपनी मां के साथ रह रही हैं।दोनों पति-पत्नी वर्ष 2018 से अलग-अलग रह रहे हैं। अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए माना कि उनके बीच वैवाहिक संबंध दोबारा स्थापित होने की संभावना नहीं बची है।
प्रेग्नेंसी के दौरान देखभाल नहीं करने का भी आरोप
पत्नी ने आरोप लगाया था कि गर्भावस्था के दौरान पति और उसके परिवार ने उसकी उचित देखभाल नहीं की। उसे पर्याप्त और सही भोजन तक नहीं दिया गया।पत्नी ने फैमिली कोर्ट में अपने साथ हुए व्यवहार और वैवाहिक जीवन से जुड़े अन्य तथ्यों को भी सामने रखा था। अदालत ने पूरे मामले के रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया।
हाईकोर्ट में पति ने खुद अपना पक्ष रखा। उसने पत्नी की ओर से लगाए गए आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट ने मानसिक क्रूरता की व्याख्या गलत तरीके से की है।पति ने दलील दी कि उसने कभी दहेज की मांग नहीं की और न ही पत्नी या उसके परिवार को धमकी दी। उसका कहना था कि पत्नी उसके साथ रहना नहीं चाहती थी, जबकि वह अपनी बेटियों के साथ रहना चाहता था।
तलाक की अर्जी पर अधिकार क्षेत्र को भी दी चुनौती
पति ने हाईकोर्ट में यह आपत्ति भी उठाई कि अलवर फैमिली कोर्ट-2 को तलाक की अर्जी पर सुनवाई करने का अधिकार नहीं था।उसने बताया कि उसने पहले हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए याचिका दायर की थी, जिसे मंजूर कर लिया गया था। ऐसे में उसके अनुसार तलाक की अर्जी पर फैसला नहीं किया जाना चाहिए था।हालांकि, हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट की ओर से जारी तलाक की डिक्री को बरकरार रखा।