इस वर्ष मकर संक्रांति पर षटतिला एकादशी का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जो आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी माना जाता है। संक्रांति और एकादशी का एक साथ पड़ना जप, तप और दान के पुण्य को कई गुना बढ़ा देता है। धर्मशास्त्रों में ऐसे योग को मोक्षदायक और पाप नाशक कहा गया है, इसलिए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
मकर संक्रांति का ज्योतिषीय महत्व
मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे उत्तरायण का आरंभ माना जाता है। इस वर्ष सूर्य का यह गोचर 14 जनवरी को दोपहर 3 बजकर 7 मिनट पर होगा। इसी समय से महापुण्य काल आरंभ होकर शाम 6 बजे तक रहेगा, जिसमें स्नान, दान और पूजा करना विशेष फल प्रदान करता है।
एकादशी और चावल को लेकर भ्रांति
एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है और सामान्यतः इस दिन चावल का सेवन वर्जित माना जाता है। संक्रांति और एकादशी एक ही दिन होने से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि खिचड़ी पर्व कैसे मनाया जाएगा। विष्णु पुराण के अनुसार दान में चावल देने से कोई दोष नहीं लगता, इसलिए संक्रांति पर चावल का दान और खिचड़ी अर्पण करना पूर्णतः शास्त्रसम्मत है।
दान और पुण्य का विशेष महत्व
मकर संक्रांति के दिन गुड़, तिल, चावल, उड़द, कंबल और वस्त्र का दान करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल देता है। संक्रांति और एकादशी का संयोग इस पुण्य को और भी बढ़ा देता है, जिससे जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति होती है।
निरोगी और दीर्घायु रहने के उपाय
धर्माचार्यों के अनुसार इस दिन औषधि, तेल और आहार का दान करने से रोगों से मुक्ति और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। स्नान, जप, तप, श्राद्ध और तर्पण का भी विशेष महत्व बताया गया है। यह दिन न केवल धार्मिक, बल्कि स्वास्थ्य और संतुलित जीवन की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी माना गया है।
भगवान विष्णु की विशेष आराधना
षटतिला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व है। उन्हें पीले फूल, पीले फल और पीले वस्त्र अर्पित करने से शीघ्र प्रसन्नता प्राप्त होती है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई विष्णु उपासना जीवन के कष्टों को दूर कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
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